अपनी तक़रीर के दौरान मेंगल ने उस दौर का ज़िक्र किया जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान, जो अब बांग्लादेश है, में जंग के बाद पाकिस्तानी फ़ौज के लगभग 90 हज़ार जवानों और अफ़सरों ने आत्मसमर्पण किया था। उन्होंने इस घटना को पाकिस्तान की सियासी और फ़ौजी क़ियादत की नाकामी का प्रतीक बताते हुए कहा कि अवाम को अतीत की ग़लतियों से सबक़ लेना चाहिए।
सियासी जानकारों का कहना है कि मेंगल का यह बयान ऐसे वक़्त में सामने आया है जब पाकिस्तान के विभिन्न इलाक़ों, ख़ास तौर पर बलोचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK), में फ़ौजी और सुरक्षा संस्थानों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। कई स्थानों पर स्थानीय आबादी और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तनाव की ख़बरें भी सामने आती रही हैं, जिन पर सोशल मीडिया में व्यापक चर्चा देखी गई है।
मुबास्सिरों के मुताबिक़, मेंगल द्वारा 1971 की शिकस्त का हवाला देना सिर्फ़ एक ऐतिहासिक संदर्भ नहीं बल्कि मौजूदा सियासी माहौल में सुरक्षा प्रतिष्ठान की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। उनके बयान को विपक्षी हलकों में समर्थन मिला है, जबकि हुकूमत समर्थक तबकों ने इसे गैर-ज़िम्मेदाराना करार दिया है।
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर भी मेंगल के बयान की वीडियो क्लिप्स और अंश तेज़ी से वायरल हुए। कई यूज़र्स ने इसे फ़ौजी प्रतिष्ठान पर तीखा तंज़ बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रीय संस्थाओं के मनोबल को प्रभावित करने वाला बयान कहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान पाकिस्तान में नागरिक-फ़ौज संबंधों को लेकर चल रही बहस को और तेज़ कर सकते हैं।
बलोचिस्तान की सियासत में लंबे समय से सक्रिय अख्तर मेंगल पहले भी कई मौक़ों पर संघीय हुकूमत और सुरक्षा एजेंसियों की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि बलोचिस्तान के अवाम को राजनीतिक अधिकार, संसाधनों में हिस्सेदारी और इंसाफ़ की ज़रूरत है। यही वजह है कि उनके बयानों को अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ध्यान मिलता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि 1971 की जंग और उसके नतीजों का ज़िक्र पाकिस्तान की सियासत में आज भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में किसी प्रमुख सियासी नेता द्वारा उस घटना को मौजूदा परिस्थितियों से जोड़कर पेश करना निश्चित तौर पर बहस और प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है।
फ़िलहाल, अख्तर मेंगल के बयान पर पाकिस्तानी फ़ौज की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, सियासी गलियारों में इस मुद्दे पर चर्चा लगातार जारी है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह बयान पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में एक अहम मुद्दा बन सकता है।


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