मोहम्मद शफी मलिक के खिलाफ हत्या, दंगा, अवैध हथियार रखने और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़े कई गंभीर मामले दर्ज बताए जाते हैं। विस्तृत जांच और सभी तथ्यों की पुष्टि के बाद उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(c) के तहत सेवा से हटाया गया। यह कदम सिर्फ एक कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि उस पूरे आतंकवादी तंत्र के खिलाफ संदेश है जो वर्षों तक सरकारी संस्थानों और समाज के अलग-अलग हिस्सों में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश करता रहा।
जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान आतंक के खिलाफ नीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अब सिर्फ हथियार उठाने वाले आतंकियों पर ही नहीं, बल्कि उन्हें समर्थन देने वाले पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई की जा रही है। चाहे वह आर्थिक मदद हो, वैचारिक समर्थन हो या सरकारी संस्थानों के भीतर किसी प्रकार की सहानुभूति, प्रशासन हर स्तर पर इसे खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहा है।
यिम कदम साफ तौर पर यह दिखावान कि जम्मू-कश्मीर में अब कानून की हुकूमत सबसे ऊपर है। अवाम की सुरक्षा और अमन-ओ-सुकून को कायम रखना सरकार की पहली तरजीह बन चुकी है। आतंक के खिलाफ यह सख्त रवैया केवल सुरक्षा का मसला नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के बेहतर मुस्तकबिल की बुनियाद भी है।
उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा की अगुवाई में जम्मू-कश्मीर प्रशासन लगातार यह संदेश दे रहा है कि आतंकवाद और उसके समर्थकों के लिए "जीरो टॉलरेंस" की नीति पर किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। सरकारी महकमों को पारदर्शी, जवाबदेह और पूरी तरह राष्ट्रहित के अनुरूप बनाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। इसी का नतीजा है कि आज घाटी के हालात तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं।
एक वक्त था जब डर और अनिश्चितता का माहौल आम लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ता था। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। सैलानी बड़ी तादाद में कश्मीर का रुख कर रहे हैं, कारोबार बढ़ रहा है, नौजवान खेल, तालीम और रोजगार के नए अवसरों की ओर बढ़ रहे हैं। गांवों से लेकर शहरों तक विकास की नई परियोजनाएं अमल में लाई जा रही हैं और लोगों में भविष्य को लेकर भरोसा मजबूत हुआ है।
कश्मीरी में कहा जाता है, "यिम हालात बदलान, तिम अवामस ज़िंदगी बदलेन।" यानी जब हालात बदलते हैं तो लोगों की जिंदगी भी बदलती है। आज जम्मू-कश्मीर उसी बदलाव की कहानी लिख रहा है, जहां बंदूक की जगह किताब, डर की जगह उम्मीद और हिंसा की जगह तरक्की ने लेनी शुरू कर दी है।
आतंक के इकोसिस्टम को जड़ से खत्म करने की यह मुहिम केवल सुरक्षा एजेंसियों की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। प्रशासन के हालिया फैसले यह साबित करते हैं कि जम्मू-कश्मीर अब अमन, स्थिरता और विकास की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में यह उम्मीद और भी मजबूत होती दिख रही है कि यह धरती, जो अपनी खूबसूरती और मेहमाननवाजी के लिए जानी जाती है, अब स्थायी शांति और तरक्की की नई मिसाल भी बनेगी।


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