जानकारों के मुताबिक, पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी का फिर से मजबूत होना है। साल 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद टीटीपी को नए ठिकाने और सुरक्षित पनाहगाहें मिलीं, जिसके बाद उसने पाकिस्तान के अंदर अपने हमलों की रफ्तार तेज कर दी। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में लगातार हमले हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक और सुरक्षाकर्मी मारे जा रहे हैं।
मगर यह कहानी सिर्फ मौजूदा हालात की नहीं है। हकीकत यह है कि पाकिस्तान ने कई दशकों तक आतंकवादी संगठनों को अपनी रणनीतिक नीति का हिस्सा बनाए रखा। कभी इन्हें "स्ट्रेटेजिक एसेट" कहा गया, तो कभी पड़ोसी देशों में अस्थिरता फैलाने के लिए इस्तेमाल किया गया। इन संगठनों को पनाह, प्रशिक्षण और हर तरह की मदद देने के आरोप लंबे समय से पाकिस्तान पर लगते रहे हैं। आज वही नीति उसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बनकर सामने आई है।
कश्मीरी और उर्दू लहजे में कहा जाए तो, "जिस दहशतगर्दी को पाकिस्तान ने अपने मतलब के लिए पाल-पोस कर बड़ा किया, वही आज उसके लिए अज़ाब बन गई है।" जो बंदूकें कभी दूसरों की तरफ मोड़ी जाती थीं, आज वही पाकिस्तान के अपने जवानों को निशाना बना रही हैं। यह एक ऐसी हकीकत है, जिससे अब पाकिस्तान खुद भी इंकार नहीं कर पा रहा।
पाकिस्तान की संसद में सामने आया 4,317 सैनिकों की मौत का आंकड़ा इस बात की गवाही देता है कि आतंकवाद को एक औजार की तरह इस्तेमाल करने की नीति आखिरकार नाकाम साबित हुई है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद कभी किसी एक सीमा या मकसद तक सीमित नहीं रहता। जब उसे बढ़ावा दिया जाता है, तो वह अंततः अपने संरक्षकों के लिए भी खतरा बन जाता है।
आज पाकिस्तान जिस संकट का सामना कर रहा है, उसे कई विश्लेषक "टेरर ब्लोबैक" यानी आतंकवाद के पलटवार के तौर पर देखते हैं। दशकों तक आतंकवादी नेटवर्क को सहारा देने की नीति अब उसके लिए भारी पड़ रही है। जिन तत्वों को कभी ताकत समझा गया था, वही अब पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुके हैं।
पाकिस्तान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ आतंकवादी हमलों को रोकने की नहीं, बल्कि उस सोच और नीति से बाहर निकलने की है जिसने इस पूरे संकट को जन्म दिया। अगर अतीत की गलतियों से सबक नहीं लिया गया, तो हालात और भी गंभीर हो सकते हैं।
आज की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला मुल्क अब खुद आतंकवाद का शिकार बन चुका है। यह घटनाक्रम दुनिया के सामने एक बार फिर यह साबित करता है कि दहशतगर्दी को नीति का हिस्सा बनाना आखिरकार खुद अपने लिए ही सबसे बड़ा खतरा साबित होता है।


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