पीओजेके में पाकिस्तान का दमन, शासन के गहराते संकट का खुलासा



पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर यानी पीओजेके में हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के हालिया बयान ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि वहां की हुकूमत और अवाम के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है। जनता की परेशानियों को सुनने और उनके मसलों का हल निकालने के बजाय पाकिस्तान की सरकार ने डराने और दबाने की नीति अपनाई है।

ख्वाजा आसिफ ने पीओजेके में चल रहे विरोध प्रदर्शन को "बगावत की शुरुआत" करार देते हुए सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। उनका यह बयान उस समय आया है जब इलाके के लोग बिजली की बढ़ती कीमतों, महंगाई और जरूरी सुविधाओं की कमी के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। अवाम का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस इलाके के लोग खुद बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रहे हैं जबकि उनके संसाधनों का फायदा कहीं और पहुंच रहा है।

पीओजेके में ये विरोध प्रदर्शन अचानक नहीं हुए हैं। इसके पीछे सालों से जमा होता गुस्सा और मायूसी है। बिजली के भारी भरकम बिल, आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और रोजमर्रा की चीजों की कमी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। लोगों का आरोप है कि उनके भविष्य से जुड़े फैसले उनकी राय के बिना लिए जाते हैं और उनकी आवाज को लगातार नजरअंदाज किया जाता है।

अपने बयान में ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 5 और कुरान की एक आयत का हवाला देते हुए कहा कि राज्य के प्रति वफादारी हर नागरिक का फर्ज है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी कि वे तय सीमाओं को पार न करें। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अपने अधिकारों की मांग करना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताना बगावत कहलाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और आलोचना को नागरिकों का अधिकार माना जाता है न कि कोई जुर्म।

विरोध प्रदर्शन के बाद पाकिस्तान सरकार ने जिस तरह की कार्रवाई की है उसने हालात को और ज्यादा गंभीर बना दिया है। प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कई कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किए गए और प्रदर्शन को रोकने के लिए सुरक्षा बलों की भारी तैनाती कर दी गई। झड़पों में कम से कम ग्यारह लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबरें सामने आई हैं। इन घटनाओं ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और मानवाधिकारों के प्रति उसके रवैये पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जनता की आवाज को बल प्रयोग से ज्यादा दिनों तक दबाया नहीं जा सकता। जब सरकारें बातचीत की जगह गिरफ्तारियों, प्रतिबंधों और धमकियों का सहारा लेती हैं तो जनता का भरोसा और ज्यादा कमजोर हो जाता है। पीओजेके में बढ़ता जनाक्रोश इसी बात का संकेत है कि वहां के लोग अब अपनी समस्याओं पर चुप रहने को तैयार नहीं हैं।

इस पूरे संकट की जड़ आर्थिक समस्याएं हैं। लोग लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि जिस इलाके से बड़ी मात्रा में बिजली पैदा होती है वहीं के लोगों को महंगी बिजली क्यों खरीदनी पड़ रही है। महंगाई ने आम परिवारों की कमर तोड़ दी है जबकि बेरोजगारी ने युवाओं के सामने भविष्य का संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे हालात में विरोध प्रदर्शन लोगों के लिए अपनी बात कहने का एकमात्र जरिया बन गया है।

पीओजेके में हो रही कार्रवाई का असर केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान लंबे समय से खुद को लोगों के अधिकारों का समर्थक बताता रहा है। लेकिन पीओजेके में प्रदर्शनकारियों के साथ किया जा रहा व्यवहार उसकी कथनी और करनी के बीच के अंतर को उजागर करता है। दुनिया भर में अब यह सवाल उठने लगा है कि जो देश लोकतंत्र और अधिकारों की बात करता है वह अपने ही नियंत्रण वाले इलाके में लोगों की आवाज क्यों दबा रहा है।

आज पाकिस्तान के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है। क्या वह दमन और सख्ती का रास्ता अपनाकर हालात को और बिगाड़ेगा या फिर लोगों की शिकायतों को सुनकर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाएगा। पीओजेके के हालात केवल कानून व्यवस्था का मसला नहीं हैं बल्कि यह राजनीतिक असंतोष, आर्थिक संकट और जनता की बढ़ती नाराजगी की कहानी है। आने वाले दिनों में पाकिस्तान का रवैया न केवल पीओजेके का भविष्य तय करेगा बल्कि दुनिया के सामने उसकी विश्वसनीयता की भी परीक्षा लेगा।

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