
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ और इसराइली रक्षा मंत्री के बीच कथित बातचीत हुई, जिसमें लेबनान में पाकिस्तानी फ़ौजियों की तैनाती जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अगर ऐसी खबरों में ज़रा भी सच्चाई है, तो यह पाकिस्तान की उस आधिकारिक लाइन से बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करती है, जिसमें वह इसराइल के साथ किसी भी तरह के रिश्ते से इंकार करता रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर इसराइल के साथ किसी स्तर पर संपर्क और सहयोग संभव है, तो फिर पाकिस्तानी अवाम के सामने दशकों से अलग कहानी क्यों पेश की जाती रही? आखिर क्यों हर चुनाव, हर सियासी संकट और हर आर्थिक नाकामी के दौरान फ़लस्तीन का मुद्दा अचानक सुर्खियों में लाया जाता है? आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान की सियासी और फौजी क़ियादत ने कई बार मज़हबी जज़्बात को एक सियासी औज़ार की तरह इस्तेमाल किया है।
आज पाकिस्तान गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। महंगाई आसमान छू रही है, बेरोज़गारी बढ़ रही है, विदेशी कर्ज़ का बोझ लगातार भारी होता जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ऐसे हालात में पाकिस्तान की विदेश नीति पर भी दबाव बढ़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक मजबूरियां कई बार उन सिद्धांतों को पीछे छोड़ देती हैं, जिनका सार्वजनिक मंचों पर सबसे ज्यादा प्रचार किया जाता है।
यही वजह है कि पाकिस्तान पर अक्सर “डबल गेम” खेलने के आरोप लगते रहे हैं। एक तरफ़ वह मुस्लिम दुनिया में फ़लस्तीन के सबसे बड़े समर्थकों में शामिल होने का दावा करता है, वहीं दूसरी तरफ़ उसके आलोचक कहते हैं कि परदे के पीछे भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों के आधार पर फैसले लिए जाते हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि सिद्धांतों से ज्यादा प्राथमिकता रणनीतिक लाभ और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों को दी जाती है।
कश्मीर से लेकर फ़लस्तीन तक, पाकिस्तान ने लंबे समय से धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों को अपनी विदेश नीति के प्रचार का अहम हिस्सा बनाया है। लेकिन जब जमीनी हकीकत और सार्वजनिक बयानों के बीच फासला बढ़ता है, तो विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाज़िमी हो जाता है। मुस्लिम दुनिया के कई पर्यवेक्षक भी यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या पाकिस्तान वास्तव में उन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है जिनकी वह बात करता है, या फिर यह सब परिस्थितियों के हिसाब से बदलने वाली रणनीति का हिस्सा है।
अगर पाकिस्तान वास्तव में फ़लस्तीन के मुद्दे पर सिद्धांतवादी रुख़ रखता है, तो उसे अपनी नीतियों में पारदर्शिता दिखानी होगी और किसी भी तरह के गुप्त संपर्कों या विरोधाभासी संकेतों पर स्पष्ट जवाब देना होगा। वरना यह धारणा और मजबूत होगी कि फ़लस्तीन का मुद्दा सिर्फ़ सियासी भाषणों और घरेलू समर्थन हासिल करने का जरिया बन चुका है।
आलोचकों का कहना है कि आज पाकिस्तान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ़ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि भरोसे का संकट भी है। जब बयान कुछ और हों और कदम कुछ और, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। और यही सवाल आज पाकिस्तान की सियासत, उसकी विदेश नीति और उसके कथित सिद्धांतों के सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।
फ़लस्तीन के नाम पर जज़्बाती तक़रीरें करना आसान है, लेकिन असली इम्तिहान उस वक़्त होता है जब सिद्धांतों और हितों में से किसी एक को चुनना पड़े। पाकिस्तान पर लग रहे आरोप इसी इम्तिहान की तरफ़ इशारा करते हैं, जहां उसके आलोचक दावा कर रहे हैं कि उसने बार-बार सिद्धांतों से ज्यादा राजनीतिक और रणनीतिक फ़ायदे को तरजीह दी है। यही वजह है कि “पाकिस्तान का दोहरा खेल” एक बार फिर बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है।

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