हालिया दिनों में एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हजारों पाकिस्तानी नौजवानों ने ऐसे पोस्ट और वीडियो साझा किए जिनमें अमन, जवाबदेही और इंसाफ की मांग की गई। कई युवाओं ने यह सवाल उठाया कि आखिर हर बार मुल्क हिंसा और दहशतगर्दी की आग में क्यों झोंका जाता है और क्यों आम अवाम को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। नौजवानों का कहना है कि लंबे अरसे से मुल्क में डर, सेंसरशिप और दबाव का माहौल कायम किया गया, लेकिन अब नई पीढ़ी इस खामोशी को तोड़ना चाहती है।
इस बढ़ती नाराज़गी के पीछे मुल्क की खराब आर्थिक हालत, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और लगातार सियासी टकराव को भी बड़ा कारण माना जा रहा है। पाक युवा महसूस कर रहे हैं कि हर संकट का असर सबसे ज्यादा आम लोगों और खासकर नौजवान तबके पर पड़ता है, जबकि सत्ता और ताकत के मरकज़ जवाबदेही से दूर रहते हैं। कई छात्रों और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने अपने वीडियो संदेशों में कहा कि मुल्क को बंदूक और डर की नहीं बल्कि तालीम, रोजगार और अमन की जरूरत है।
पाकिस्तान के कई शहरों में छोटे स्तर पर हुए एहतिजाजों में युवाओं ने हाथों में तख्तियां लेकर “अमन चाहिए”, “खौफ नहीं आज़ादी” और “नौजवान जंग नहीं भविष्य मांगते हैं” जैसे नारे लगाए। इन प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। कुछ जगहों पर युवाओं ने कथित जबरन गुमशुदगियों, सियासी दमन और आवाज़ दबाने की कोशिशों के खिलाफ भी नाराज़गी जताई।
माहिरीन का मानना है कि यह बदलता हुआ माहौल पाकिस्तान के अंदर एक नए सामाजिक और सियासी बदलाव की निशानी हो सकता है। पहले जहां फौज के खिलाफ खुलकर बोलना मुश्किल माना जाता था, वहीं अब बड़ी संख्या में युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए अपनी राय रख रहे हैं। हालांकि कई एक्टिविस्ट्स का यह भी कहना है कि आवाज़ उठाने वालों को डराने, अकाउंट बंद कराने और दबाव बनाने की कोशिशें अब भी जारी हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर विरोध की आवाज़ें लगातार मजबूत होती जा रही हैं।
सियासी जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान का नौजवान तबका अब इंतिहापसंदी और हिंसा की सियासत से दूरी चाहता है। युवाओं का कहना है कि मुल्क की पहचान दहशत, कट्टरता और खौफ से नहीं बल्कि तरक्की, इल्म और इंसानी हकूक से होनी चाहिए। कई पोस्ट्स में यह भी कहा गया कि अगर मुल्क को स्थिर और मजबूत बनाना है तो हर इदारे को जवाबदेह बनाना होगा और आम लोगों की आवाज़ सुननी होगी।
सोशल मीडिया पर चल रही यह नई बहस अब सिर्फ ऑनलाइन दायरों तक सीमित नहीं रह गई बल्कि यह धीरे-धीरे सड़क तक पहुंचती दिखाई दे रही है। नौजवानों के अंदर यह एहसास बढ़ रहा है कि अगर उन्होंने अब आवाज़ नहीं उठाई तो आने वाली नस्लें भी डर और बेयकीनी के माहौल में जीने पर मजबूर रहेंगी। यही वजह है कि बड़ी तादाद में पाक युवा अब खुलकर अमन, इंसाफ और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
मुल्क के भीतर उठती यह आवाज़ें साफ इशारा करती हैं कि पाकिस्तान का युवा तबका अब हिंसा, कट्टरता और कथित फौजी दबाव के खिलाफ नई सोच के साथ सामने आ रहा है। “पाक यूथ रिजेक्ट एक्सट्रीमिज्म एंड फियर” का यह पैगाम धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक नैरेटिव की शक्ल लेता दिखाई दे रहा है, जहां नौजवान डर नहीं बल्कि अमन और मुस्तकबिल की बात कर रहे हैं।
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