बलूचिस्तान में हालात पर गवर्नर का इकरार, अमन-ओ-अमान की सूरत-ए-हाल पर उठे नए सवाल

भारी खर्च, बड़े पैमाने पर सुरक्षा तैनाती और दशकों के इंतिज़ाम के बावजूद स्थायी इस्तेहकाम अब भी चुनौती



क्वेटा, विशेष प्रतिनिधि: बलूचिस्तान के गवर्नर जाफर खान मंडोखैल के हालिया बयान ने सूबे की कानून-व्यवस्था और हुकूमती कारगुज़ारी को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, गवर्नर ने माना कि बलूचिस्तान में अमन-ओ-अमान की सूरत-ए-हाल तश्वीशनाक बनी हुई है और तमाम कोशिशों के बावजूद हालात पूरी तरह काबू में नहीं आ सके हैं।

सियासी और सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि यह बयान ऐसे वक्त सामने आया है जब बलूचिस्तान में हुकूमती नीतियों, विकासी मंसूबों और सुरक्षा इंतिज़ामात की असरदारी पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। कई पर्यवेक्षकों के मुताबिक, दशकों से जारी प्रशासनिक नियंत्रण, बड़े पैमाने पर सुरक्षा तैनाती और अरबों-खरबों रुपये के खर्च के बावजूद सूबे में स्थायी इस्तेहकाम कायम करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

गवर्नर के बयान के बाद विपक्षी हलकों और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने दावा किया कि यह इकरार इस बात की निशानदेही करता है कि अब स्वयं हुकूमती हलकों में भी हालात की गंभीरता को महसूस किया जा रहा है। उनका कहना है कि केवल सुरक्षा उपायों के जरिए दीर्घकालिक समाधान हासिल करना मुश्किल साबित हुआ है और इसके लिए अवामी भरोसे, बेहतर हुकूमतदारी और राजनीतिक मुशावरत की ज़रूरत है।

कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि बलूचिस्तान में विकासी परियोजनाओं और सरकारी निवेश के बावजूद आम लोगों की शिकायतें पूरी तरह दूर नहीं हो सकी हैं। उनका कहना है कि किसी भी इलाके में पायेदार अमन तभी मुमकिन है जब सुरक्षा के साथ-साथ रोज़गार, तालीम, बुनियादी सहूलियतों और अवामी नुमाइंदगी को भी बराबर अहमियत दी जाए।

इस बीच, कुछ बलूच संगठनों और कार्यकर्ताओं ने गवर्नर के बयान को अपने उस मौक़िफ़ के समर्थन के तौर पर पेश किया है जिसमें वे लंबे समय से यह दावा करते रहे हैं कि सरकारी नीतियां अवाम का मुकम्मल एतिमाद हासिल करने में नाकाम रही हैं। दूसरी ओर, सरकारी हलकों का कहना है कि हालात को बेहतर बनाने के लिए विकास, सुरक्षा और प्रशासनिक सुधारों के कई कार्यक्रम जारी हैं और इनके नतीजे धीरे-धीरे सामने आएंगे।

सियासी जानकारों के मुताबिक, गवर्नर द्वारा अवाम से तआवुन की अपील इस बात का भी संकेत है कि हुकूमत स्थानीय आबादी की ज्यादा भागीदारी और सहयोग चाहती है। उनका कहना है कि किसी भी सूबे में पायेदार अमन और तरक्की का रास्ता अवाम और हुकूमत के दरमियान मजबूत एतिमाद से होकर गुजरता है।

बलूचिस्तान लंबे अरसे से सुरक्षा, विकास और राजनीतिक मसाइल के कारण सुर्खियों में रहा है। गवर्नर का हालिया बयान एक बार फिर इस सवाल को सामने लेकर आया है कि क्या बड़े वित्तीय खर्च और सुरक्षा इंतिज़ामात के साथ-साथ बेहतर हुकूमतदारी और अवामी भरोसे को मजबूत करने की दिशा में और कदम उठाने की जरूरत है।

माहिरीन का मानना है कि आने वाले दिनों में बलूचिस्तान की कामयाबी का पैमाना सिर्फ सुरक्षा हालात नहीं होंगे, बल्कि अवाम का एतिमाद, मआशी तरक्की, नौजवानों के लिए मौके और सामाजिक बहबूदी भी अहम भूमिका अदा करेंगे। यही अमल तय करेगा कि सूबा स्थायी अमन और इस्तेहकाम की मंज़िल की तरफ किस रफ्तार से बढ़ता है।

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