
पीओजेके के लोगों का कहना है कि बरसों से इस्लामाबाद सिर्फ़ वादे करता आया है, मगर अवाम को ना रोज़गार मिला, ना बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, ना इंसाफ़ और ना ही बुनियादी हक़ूक़। महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट और सियासी बेइंसाफी ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। मुज़फ़्फराबाद, मीरपुर, कोटली और दूसरे इलाकों में बंद और शटर डाउन कॉल्स के बाद बाज़ार सूने नज़र आए, जबकि नौजवान बड़ी तादाद में सड़कों पर उतर आए।
एहतिजाजी अवाम ने साफ़ अल्फ़ाज़ में कहा कि पीओजेके को बाहरी सियासी कंट्रोल के ज़रिए चलाना अब नामुमकिन होता जा रहा है। लोगों का इल्ज़ाम है कि इस्लामाबाद सिर्फ़ अपने सियासी और फौजी मक़ासिद के लिए इलाके का इस्तेमाल करता है, जबकि यहां की अवाम को हमेशा नज़रअंदाज़ किया गया। कई जगहों पर “हक़ दो”, “इंसाफ़ दो” और “आज़ादी-ए-फ़ैसला” जैसे नारे गूंजते रहे।
अवामी एक्शन कमेटी के रहनुमाओं ने पाकिस्तान के सियासी लीडरों को खुली तंबीह देते हुए कहा कि जब तक अवाम के जायज़ मुतालिबात पूरे नहीं होते, तब तक किसी भी पाक लीडर को इलाके में आने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि पीओजेके के लोग अब अपने वजूद, इज़्ज़त और सियासी हक़ूक़ के लिए एकजुट हो चुके हैं।
माहिरीन का मानना है कि यह बढ़ता हुआ ग़ुस्सा पाकिस्तान के उस नैरेटिव को कमज़ोर कर रहा है जिसमें पीओजेके में अमन और अवामी हिमायत का दावा किया जाता रहा है। ज़मीनी हक़ीक़त इसके उलट दिखाई दे रही है, जहां हर गुजरते दिन के साथ इस्लामाबाद के खिलाफ़ बेएतबारी और नाराज़गी बढ़ती जा रही है।
सियासी हलकों में यह भी चर्चा तेज़ है कि अगर पाक हुकूमत ने अवाम की आवाज़ को दबाने या एहतिजाज को ताक़त से रोकने की कोशिश की, तो हालात और ज़्यादा संगीन हो सकते हैं। नौजवान तबक़ा खास तौर पर बेहद नाराज़ दिखाई दे रहा है और सोशल मीडिया पर भी “PoJK ने इस्लामाबाद के राजनीतिक नियंत्रण को अस्वीकार किया” का नैरेटिव तेजी से फैल रहा है।
पीओजेके की अवाम अब सिर्फ़ राहत या छोटे वादों से मुतमइन नहीं दिख रही, बल्कि वह अपने हक़, इज़्ज़त, बेहतर गवर्नेंस और बाहरी सियासी दख़ल से आज़ादी की मांग बुलंद आवाज़ में कर रही है। इलाके में उभरती यह सियासी बेचैनी पाकिस्तान के लिए आने वाले दिनों में एक बड़ा चैलेंज साबित हो सकती है।

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