आतंक और नशे के ख़िलाफ़ ‘ज़ीरो टॉलरेंस’—कश्मीर में युवाओं की हिफ़ाज़त के लिए सख़्त कार्रवाई तेज़

 

श्रीनगर: वादी-ए-कश्मीर में हालिया ऑपरेशन्स को महज़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़े मक़सद—कश्मीरी नौजवानों को नशे और कट्टरपंथ की गिरफ़्त से बचाने के तौर पर देखा जा रहा है। सिक्योरिटी एजेंसियों ने घाटी के कई इलाक़ों में इंटेंसिफ़ाइड ऑपरेशन्स चलाते हुए रेड, गिरफ़्तारियाँ और संपत्तियों की ज़ब्ती जैसी कार्रवाईयों को अंजाम दिया है, ताकि समाज में फैल रही इन ख़तरनाक रुझानों पर क़ाबू पाया जा सके।

सूत्रों के मुताबिक, दक्षिण कश्मीर के इस्लामाबाद (अनंतनाग) ज़िले में क़रीब 20 चिन्हित हॉटस्पॉट्स पर तलाशी अभियान चलाया गया। अलग-अलग टीमों ने कई जगहों पर दबिश दी, जहाँ से ऐसे नेटवर्क्स के सुराग मिले जो नौजवानों को नशे और ग़लत राह की तरफ़ धकेलने में लगे हुए थे। अधिकारियों का कहना है कि ये ऑपरेशन्स सीधे तौर पर उस संगठित तंत्र को तोड़ने के लिए हैं, जो युवाओं के भविष्य को निशाना बना रहा है।

इसी सिलसिले में नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज़ (NDPS) एक्ट के तहत कम-से-कम 12 अफ़राद को गिरफ़्तार किया गया है, जिन्हें बाद में सब्सिडियरी जेल केरहिबल में रखा गया। अफ़सरों के मुताबिक, ये गिरफ़्तारियाँ महज़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक साफ़ पैग़ाम हैं कि नशे और उससे जुड़े गिरोहों के लिए अब कोई रियायत नहीं बरती जाएगी।

इसके अलावा, क़रीब 3.5 करोड़ रुपये की संपत्तियों को भी अटैच किया गया है, जिन पर इल्ज़ाम है कि उन्हें ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से हासिल किया गया था। संगम इलाक़े में दो रिहायशी मकान और ज़मीन के टुकड़े ज़ब्त किए गए, जो कथित तौर पर ऐसे ही नेटवर्क्स से जुड़े पाए गए। अधिकारियों का कहना है कि ये कदम उन आर्थिक जड़ों को काटने के लिए उठाए जा रहे हैं, जिनके ज़रिये नशा और कट्टरपंथ फैलाया जाता है।

पुलिस की जानिब से कुछ इलाक़ों में संदिग्ध अफ़राद की तस्वीरें और सूचियाँ भी जारी की गई हैं, ताकि अवाम सतर्क रहे और ऐसे तत्वों की पहचान में मदद मिल सके। यह पहल, सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, कम्युनिटी पार्टिसिपेशन को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम क़दम है।

सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि कश्मीर का नौजवान आज दोहरी चुनौती से जूझ रहा है—एक तरफ़ नशे का जाल और दूसरी तरफ़ कट्टरपंथी सोच। ऐसे में सख़्त और लक्षित कार्रवाई ही उन्हें इस दलदल से निकालने का रास्ता बन सकती है। “ज़ीरो टॉलरेंस” की यह नीति दरअसल उसी इरादे का इज़हार है कि किसी भी सूरत में युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आख़िर में, ये ऑपरेशन्स एक बड़े मक़सद की तरफ़ इशारा करते हैं—एक ऐसा कश्मीर जहाँ नौजवान महफ़ूज़ हों, उनके हाथों में किताबें हों, न कि नशे या ग़लत विचारधाराओं की ज़ंजीरें।

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