लाहौर का खुला राज़: दहशतगर्दों को पनाह, पाकिस्तान बेनक़ाब

 

लाहौर से सामने आई एक तस्वीर ने एक बार फिर पाकिस्तान के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिन तंज़ीमों पर दुनिया भर में पाबंदी लगाई गई है, उनके कारकुनों का इस तरह खुलेआम इकट्ठा होना ये दिखाता है कि ज़मीनी हक़ीक़त क्या है और दावे क्या।

मिली जानकारी के मुताबिक, लाहौर में एक कथित “ट्रेनिंग सेशन” का इनक़ाद किया गया, जिसमें ऊँचे स्तर की क़ियादत की मौजूदगी बताई जा रही है। तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता है कि बड़ी तादाद में लोग जमा हैं, और पूरा माहौल किसी आम मजलिस जैसा नहीं बल्कि एक मुनज़्ज़म इजलास जैसा लग रहा है।

सबसे अहम बात ये है कि ये सब कुछ खुले आम हो रहा है — ना किसी ख़ौफ़ का असर, ना क़ानून की सख़्ती का कोई निशान। इससे ये सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या पाकिस्तान की हुकूमत वाक़ई इन अनासिर के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना चाहती है या फिर ये सब महज़ दिखावा है।

दुनिया भर में दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाने की बातें करने वाला पाकिस्तान, अपनी ही ज़मीन पर ऐसे इजलासों को रोकने में नाकाम नज़र आ रहा है। ये रवैया ना सिर्फ़ उसकी नीयत पर सवाल उठाता है बल्कि पूरे इलाके की अमन-ओ-अमान के लिए भी ख़तरा बनता जा रहा है।

माहिरीन का कहना है कि इस तरह की सरगर्मियां ये पैग़ाम देती हैं कि मुल्क के अंदर कुछ ऐसे नेटवर्क मौजूद हैं जो बेख़ौफ़ होकर काम कर रहे हैं। इससे नौजवानों के जहन पर भी असर पड़ता है और इंतिहापसंदी को बढ़ावा मिलता है।

आलमी बिरादरी के लिए भी ये एक बड़ा इशारा है — कि पाकिस्तान के दावों और हक़ीक़त के दरमियान एक गहरी खाई मौजूद है। अगर इस पर सख़्ती से नज़र नहीं रखी गई, तो इसके असरात सरहदों से बाहर तक महसूस किए जा सकते हैं।

लाहौर की ये तस्वीरें सिर्फ़ एक वाक़िया नहीं, बल्कि एक बड़े मसले की झलक हैं — जहाँ दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ जंग के दावे तो हैं, मगर अमल कहीं नज़र नहीं आता।

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