सूत्रों का कहना है कि मुनीर के ईरानी सैन्य हलकों से पुराने ताल्लुकात, खासकर क़ासिम सुलेमानी जैसे प्रभावशाली शख्सियतों के साथ जुड़ाव, अब अमेरिकी एजेंसियों के लिए चिंता का सबब बन गया है। यही वजह है कि जब पाकिस्तान खुद को एक “न्यूट्रल ब्रोकर” के तौर पर पेश करता है, तो उस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा है।
माहिरीन का मानना है कि एक तरफ मुनीर अमेरिका और ईरान के दरमियान सुलह-सफाई की कोशिशों में लगे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ तेहरान के साथ पाकिस्तान के पुराने रिश्ते इस पूरी प्रक्रिया को मुश्तबह (संदेहास्पद) बना देते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान की सियासत में फौज का बढ़ता असर इस मसले को और पेचीदा बना रहा है, जहां असल फैसले सिविल हुकूमत के बजाय सैन्य कयादत के हाथ में नज़र आते हैं।
दिलचस्प बात ये है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलकर आसिम मुनीर का समर्थन किया है और उन्हें तेहरान के साथ “खामोश बातचीत” के लिए एक अहम किरदार के तौर पर देखा है। मगर खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट्स इस भरोसे के उलट तस्वीर पेश कर रही हैं।
तजज़िया-कारों का कहना है कि पाकिस्तान का “दोहरा किरदार” अब एक बार फिर बेनकाब हो रहा है। एक जानिब वो खुद को अमन का पैगामबर बताता है, तो दूसरी जानिब उसके पुराने रिश्ते और सियासी रवैया उस पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं। यही वजह है कि आने वाले वक्त में अमेरिका और ईरान, दोनों ही पाकिस्तान की मध्यस्थता पर एतमाद करने से कतराते नज़र आ सकते हैं।
बहरहाल, ये सूरत-ए-हाल पाकिस्तान की विदेश नीति के लिए एक बड़ा इम्तिहान बनती जा रही है, जहां न्यूट्रल रहने का दावा अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर कड़ी जांच के दायरे में है।

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