चीन–पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर और पाकिस्तान: तरक़्क़ी का सौदा या बढ़ती इनहिसार की दास्तान?


चीन–पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) पर दस्तख़त को पाकिस्तान की मआशियत के लिए एक तारीखी मोड़ के तौर पर पेश किया गया था। इसे एक ऐसी बड़ी पहल बताया गया जो मुल्क के इंफ्रास्ट्रक्चर को मॉडर्न बनाएगी, ऊर्जा की कमी को दूर करेगी और पाकिस्तान को एक अहम तिजारती हब में तब्दील कर देगी। 2015 में इसके आग़ाज़ के साथ ही ज़बरदस्त उम्मीदें पैदा हुईं। चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के एक अहम हिस्से के तौर पर, सीपेक के तहत अरबों डॉलर की सरमायाकारी का वादा किया गया, जो ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और इंडस्ट्रियल सेक्टर में लगाई जानी थी।

मगर एक दहाई से ज़्यादा अरसा गुज़रने के बाद, अब एक बड़ी तादाद में नाकिदीन (critics) यह कह रहे हैं कि इसके नताइज उन वादों से काफी अलग रहे हैं जो शुरुआत में किए गए थे। उनके मुताबिक, सीपेक ने पाकिस्तान को पायेदार तरक़्क़ी देने के बजाय उसकी मआशी कमज़ोरियों को और बढ़ाया है, बाहरी इनहिसार में इज़ाफ़ा किया है और ख़ुदमुख्तारी, इंसाफ़ और क़ौमी मुफ़ाद के हवाले से संगीन सवालात खड़े किए हैं।

सबसे बड़ा मसला कर्ज़ का है। सीपेक को “सरमायाकारी” के तौर पर पेश किया गया, लेकिन हक़ीक़त में इसका बड़ा हिस्सा चीनी सरकारी बैंकों से लिए गए कर्ज़ों पर मबनी है। ये कर्ज़ अक्सर इंटरनेशनल इदारों की आसान शर्तों वाले कर्ज़ों के मुकाबले ज़्यादा ब्याज दर पर हैं। जैसे-जैसे इनकी अदायगी का वक़्त आया, पाकिस्तान पर बाहरी कर्ज़ चुकाने का दबाव बढ़ता गया। पहले से ही कमज़ोर फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व्स पर इसका और बोझ पड़ा। इस तरह, सीपेक ने मआशी खुदमुख्तारी को मज़बूत करने के बजाय चीन पर इनहिसार को और गहरा कर दिया।

इस मसले को और पेचीदा बनाता है सीपेक के मुआहिदों में शफ्फाफ़ियत (transparency) की कमी। कई एग्रीमेंट्स अब तक पूरी तरह अवाम के सामने नहीं लाए गए, जिससे जवाबदेही और गवर्नेंस पर सवाल उठते हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन मुआहिदों में चीनी सरमायाकारों को मुक़र्रर मुनाफ़ा देने की गारंटी शामिल है, खासकर ऊर्जा सेक्टर में—चाहे बिजली की असल ज़रूरत हो या नहीं। इसके नतीजे में “कैपेसिटी पेमेंट्स” का बोझ बढ़ा है, जहां पाकिस्तान को बिजली न इस्तेमाल होने के बावजूद अदायगी करनी पड़ती है। नाकिदीन का कहना है कि ये शर्तें ज़्यादा तर विदेशी कंपनियों के हक़ में हैं और पाकिस्तान को लंबी मुद्दत के लिए माली पाबंदियों में जकड़ देती हैं।

सीपेक के प्रोजेक्ट्स का ढांचा भी तन्क़ीद का निशाना बना है। ज़्यादातर कॉन्ट्रैक्ट्स चीनी सरकारी कंपनियों को दिए गए, जो अपनी मशीनरी, टेक्नोलॉजी और कई बार लेबर भी साथ लाती हैं। इससे पाकिस्तानी इंडस्ट्री के लिए मौके कम हो गए। उम्मीद थी कि इससे लोकल इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा और स्किल डेवलपमेंट होगा, मगर ये फायदे उस पैमाने पर सामने नहीं आए।

ग्वादर पोर्ट, जो सीपेक का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है, एक और मिसाल है। इसे बलूचिस्तान में एक स्ट्रैटेजिक डीप-सी पोर्ट के तौर पर डेवलप किया गया, जो चीन को अरब सागर के रास्ते ग्लोबल मार्केट से जोड़ेगा। लेकिन स्थानीय आबादी के लिए हकीकत कुछ और ही रही। पानी, बिजली और सेहत जैसी बुनियादी सहूलतों की कमी अब भी बरक़रार है। कई लोगों ने बेदखली और फायदे से महरूम रखे जाने की शिकायत की है। इससे अवाम में बेचैनी और एहतिजाज बढ़ा है।

सीपेक ने क़ौमी खुदमुख्तारी के मसले को भी हवा दी है। चीन की बढ़ती मौजूदगी और लंबे अरसे के लीज़ एग्रीमेंट्स ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या पाकिस्तान अपने अहम असासों पर कंट्रोल खो रहा है।

सिक्योरिटी चैलेंजेस ने इस पूरे मंजरनामे को और मुश्किल बना दिया है। खासकर बलूचिस्तान जैसे इलाकों में इन प्रोजेक्ट्स को कई हमलों का निशाना बनाया गया, जिसके बाद पाकिस्तान को खास सिक्योरिटी फोर्सेस तैनात करनी पड़ीं। इससे माली बोझ बढ़ा और तालीम व सेहत जैसे सेक्टर्स से ध्यान हट गया।

माहौलियाती असरात भी कम अहम नहीं हैं। कई एनर्जी प्रोजेक्ट्स कोयले पर मबनी हैं, जिससे कार्बन एमिशन और माहौलियाती तबाही में इज़ाफ़ा हुआ है। ऐसे में, एक ऐसे मुल्क के लिए जो पहले ही क्लाइमेट चेंज के असरात झेल रहा है, ये एक बड़ा खतरा बन सकता है।

तिजारती तवाज़ुन (trade balance) पर भी इसका असर पड़ा है। सीपेक के लिए बड़ी तादाद में मशीनरी और सामान की दरामद (imports) से घाटा बढ़ा, जबकि बरामदात (exports) उतनी नहीं बढ़ पाईं। इससे कर्ज़ और अदायगी का एक चक्र बन गया है, जिसे कई माहिरीन गैर-पायेदार मानते हैं।

हालांकि, यह भी सच है कि सीपेक से कुछ फायदे हुए हैं—जैसे सड़कों का बेहतर होना, बिजली की पैदावार में इज़ाफ़ा और कनेक्टिविटी में सुधार। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये फायदे उन बड़े मसाइल के सामने काफी हैं जो इसके साथ जुड़े हैं?

“पाकिस्तान ने खुद को बेच दिया”—यह जुमला शायद सख़्त लगे, लेकिन यह उस गहरी फिक्र की झलक है जो मुल्क के मआशी और स्ट्रैटेजिक रास्ते को लेकर सामने आ रही है।

आख़िरकार, सीपेक की बहस सिर्फ एक प्रोजेक्ट की नहीं, बल्कि पाकिस्तान के मुस्तकबिल की है। क्या मुल्क बाहरी सरमाये पर मुनहसिर रहेगा या एक खुदमुख्तार और पायेदार मआशियत की तरफ बढ़ेगा?

नतीजा यह है कि सीपेक एक बड़ा मौका भी है और एक बड़ा इम्तिहान भी। इसके फायदे और नुक्सान दोनों वाज़ेह हैं—अब यह पाकिस्तान पर है कि वो इसे किस सिम्त में ले जाता है।

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