महंगाई का मारा अवाम और हुकूमत का 'डंडा-राज': कराची में जम्हूरियत शर्मसार

 
कराची: "मियां, मुल्क तो दिवालिया होने की कगार पर है और हुकूमत को अपनी आन-बान-शान की पड़ी है।" कराची प्रेस क्लब के बाहर मंजर कुछ ऐसा ही था, जहां महंगाई के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को पुलिस के जूतों तले रौंदने की पुरजोर कोशिश की गई। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की खवातीन (महिलाओं) ने जब 'दो वक्त की रोटी' और 'आसमान छूते पेट्रोल' का हिसाब मांगा, तो उन्हें बदले में 'इंसाफ' नहीं बल्कि 'हथकड़ियां' नसीब हुईं।

हुक्मरानों को शायद ये मुगालता (गलतफहमी) है कि डंडे के जोर पर वो अवाम का पेट भर देंगे। कल जब कराची की सड़कों पर 23 से ज्यादा कारकुनों (कार्यकर्ताओं) को घसीटकर वैन में डाला गया, तो साफ हो गया कि पाकिस्तान में 'जम्हूरियत' (लोकतंत्र) का जनाजा निकल चुका है। पुलिस का यह 'क्रैकडाउन' इस बात का गवाह है कि रियासत अब सवालात से डरने लगी है।

एक तरफ आटा-दाल के लिए जद्दोजहद और दूसरी तरफ निहत्थी औरतों पर पुलिसिया तशद्दुद (हिंसा)—यही आज के पाकिस्तान की हकीकत है। मकामी (स्थानीय) लोगों का कहना है कि "जब हुकूमत खजाना नहीं भर पाती, तो वो जेलें भरने लगती है।" पुलिस की ये ज्यादती महज़ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस खौफ का इजहार है जो सत्ता के गलियारों में महंगाई के शोर से पैदा हुआ है।

पाकिस्तान की ये बदहाली अब पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो चुकी है। अपनी आर्थिक नाकामियों को छिपाने के लिए हुकूमत अब डराने-धमकाने का सहारा ले रही है। लेकिन सवाल ये है कि क्या सलाखों के पीछे डालने से अवाम की भूख मर जाएगी? या ये चिंगारी किसी बड़े 'इंकलाब' का पेश-खेमा (प्रस्तावना) साबित होगी?

मुल्क को संभालने के बजाय निहत्थी औरतों पर बहादुरी दिखाने वाली ये पुलिस और वहां की सरकार आज पूरी दुनिया के लिए मजाक का सबब बन गई है।

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