पाकिस्तानी सेना के भीतर सांप्रदायिक दरार, बाहरी ताकतों के हाथ की 'किराए की फौज' बनी मिलिट्री


पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से आ रही ख़बरें वहां की सेना (Pak Army) की आंतरिक एकजुटता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। प्राप्त डेटा और रणनीतिक विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तानी सेना अब एक पेशेवर बल के बजाय शिया और सुन्नी गुटों में विभाजित हो चुकी है, जिसका इस्तेमाल निजी और विदेशी हितों के लिए किया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान ने अपने जवानों को मजहबी पहचान के आधार पर बांट दिया है: सुन्नी गुट और विदेशी फंड: सेना के सुन्नी धड़े को वित्तीय लाभ (Financial Gain) के लिए सऊदी अरब भेजा जा रहा है। आरोप है कि वहां इन सैनिकों का इस्तेमाल क्षेत्रीय संघर्षों में ईरानी शियाओं के खिलाफ एक हथियार के तौर पर किया जा रहा है। शिया गुट का शोषण: वहीं दूसरी ओर, सेना के भीतर मौजूद शिया जवानों को रणनीतिक रूप से उन मोर्चों पर तैनात किया जा रहा है जहाँ उन्हें भारत, अफगानिस्तान, पश्तून, बलोच और कश्मीरियों के खिलाफ सैन्य अभियानों में झोंका जा सके।

यह स्थिति स्पष्ट करती है कि पाकिस्तानी सेना अब संप्रभु नहीं रही। सऊदी अरब जैसे बाहरी देशों के साथ इसके गहरे और विवादास्पद संबंधों ने इसे एक 'किराए की सेना' (Mercenary Force) के रूप में तब्दील कर दिया है। विदेशी निवेश और डॉलरों के बदले पाकिस्तानी जनरलों ने अपने ही सैनिकों को वैश्विक शतरंज का मोहरा बना दिया है।

सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि संप्रदायवाद (Sectarianism) ने पाकिस्तानी सेना की अखंडता को पूरी तरह खोखला कर दिया है।

"जब किसी देश की सेना राष्ट्रीय रक्षा के बजाय फिरकापरस्ती और विदेशी एजेंडे पर चलने लगे, तो उसका पतन निश्चित है। पाक सेना की यह फूट उसके अंत की शुरुआत है।"

पश्तूनों, बलोचों और अफगान नागरिकों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि यह बल अब केवल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दमन का सहारा ले रहा है। कश्मीर के नाम पर दुनिया को गुमराह करने वाला पाकिस्तान आज खुद अपने ही सैन्य तंत्र में विभाजन की आग से झुलस रहा है।

पाकिस्तानी सेना का यह 'सांप्रदायिक कार्ड' न केवल मुल्क के भीतर अस्थिरता पैदा कर रहा है, बल्कि दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। अपनी साख बचाने की कोशिश में जुटी पाक मिलिट्री अब खुद अपने ही बुने हुए जाल में फंस चुकी है।

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