पहलगाम के बाद उठे सख़्त सवाल: क्या पाकिस्तान के रिश्ते दहशतगर्द तंजीमों से अब भी क़ायम हैं?


पहलगाम में हुए दर्दनाक हमले, जिसमें 27 बेगुनाह लोगों की जान चली गई, के बाद इलाक़े में ग़म और ग़ुस्से का माहौल है। इस हमले ने एक बार फिर सरहद पार दहशतगर्दी के मसले को सुर्खियों में ला खड़ा किया है।

हालिया रिपोर्ट्स और दावों में ये बात सामने आई है कि पाकिस्तान के दिफ़ा मंत्री Khwaja Asif की मुलाक़ात लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े नेता Talha Saeed से हुई। इन दावों की आधिकारिक तौर पर तस्दीक़ हो गयी हैजिससे इस तरह की ख़बरों ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।

तजज़िया निगारों का कहना है कि अगर ऐसे राब्तों की पुष्टि होती है, तो ये इस बात की तरफ़ इशारा करेगा कि पाकिस्तान के सियासी और फौजी हल्कों का ताल्लुक़ अब भी उन तंजीमों से जुड़ा हो सकता है, जिन पर भारत समेत कई मुल्क दहशतगर्दी के इल्ज़ाम लगाते आए हैं।

लश्कर-ए-तैयबा का नाम पहले भी कई बड़े हमलों के साथ जोड़ा जाता रहा है, और इसी वजह से ये तंजीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी और पाबंदियों के दायरे में रही है। ऐसे में किसी भी तरह की कथित मुलाक़ात या नज़दीकी, चाहे वो साबित हो या न हो, पहले से मौजूद शुबहात को और गहरा कर देती है।

माहिरीन का ये भी कहना है कि दहशतगर्द तंजीमों को अलग-अलग सियासी या सामाजिक चेहरों के पीछे छुपाने की कोशिशें नई नहीं हैं। मगर इससे उनका अतीत मिट नहीं जाता, बल्कि उल्टा ये शक और मज़बूत होता है कि कहीं न कहीं एक संगठित निज़ाम काम कर रहा है।

आलमी बिरादरी के लिए ये वक़्त सिर्फ़ बयान देने का नहीं, बल्कि ठोस और मुत्तहिद क़दम उठाने का है। अगर दहशतगर्दी के खिलाफ जंग को गंभीरता से लेना है, तो हर उस कड़ी की जांच ज़रूरी है जो इस ख़तरे को ज़िंदा रखती है।

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