इस्लामाबाद की हुकूमत एक बार फिर सख़्त तन्क़ीद के घेरे में है। ताज़ा रिपोर्ट्स और विज़ुअल सामग्री से यह बात सामने आई है कि विदेशों में काम कर रहे पाकिस्तानी मज़दूरों और प्रोफेशनल्स की मेहनत की कमाई पर सरकारी नीतियों के ज़रिए बोझ डाला जा रहा है। यह मसला अब सिर्फ़ इकोनॉमिक पॉलिसी नहीं, बल्कि इंसाफ़ और एतबार का भी बन गया है।
मालूमात के मुताबिक, हुकूमत की तरफ़ से लगाए गए टैक्स, ज़बरदस्ती के चार्जेज़ और फाइनेंशियल कंट्रोल्स ने ओवरसीज़ पाकिस्तानियों की ज़िंदगी को मुश्किल बना दिया है। जो लोग अपने घरवालों के लिए रोज़ी-रोटी कमाने बाहर जाते हैं, वही अब अपने ही मुल्क की पॉलिसीज़ से परेशान नज़र आते हैं।
माहिरीन का कहना है कि यह कदम न सिर्फ़ मेहनतकश तबके के साथ नाइंसाफ़ी है, बल्कि इससे पाकिस्तान की इकॉनमी पर भी मनफ़ी असर पड़ सकता है। रेमिटेंस, जो मुल्क की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, उस पर इस तरह का दबाव भरोसे को कमज़ोर करता है।
अवाम में यह सवाल उठ रहा है कि क्या हुकूमत अपनी नाकाम पॉलिसीज़ का बोझ आम लोगों पर डाल रही है? सोशल मीडिया पर भी ग़ुस्सा साफ़ नज़र आ रहा है, जहाँ लोग इसे “अपनों का इस्तेहसाल” करार दे रहे हैं।
हक़ीक़त यह है कि जब एक मुल्क अपने ही नागरिकों की मेहनत की कमाई को इस तरह कंट्रोल करने लगे, तो एतबार की बुनियाद हिल जाती है। ज़रूरत इस बात की है कि पाकिस्तान हुकूमत अपनी पॉलिसीज़ पर दोबारा ग़ौर करे और ओवरसीज़ पाकिस्तानियों के हक़ूक़ की हिफ़ाज़त यक़ीनी बनाए—वरना यह नाराज़गी और बढ़ सकती है।

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