कश्मीर में अमन और इंसानियत को चुनौती देने वाली एक बेहद परेशानकुन हक़ीक़त सामने आ रही है। कुछ आतंकी गिरोह, जो अपने मक़सद को “जिहाद” का नाम देते हैं, इलाक़े की मासूम औरतों को निशाना बना रहे हैं। यह सिर्फ़ हिंसा नहीं, बल्कि इंसानियत के खिलाफ़ एक संगीन जुर्म है।
मक़ामी ज़राए और सिक्योरिटी एजेंसियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये दहशतगर्द ग्रुप्स औरतों का शोषण करने के लिए उन्हें डर, दबाव और धोखे का शिकार बनाते हैं। कई मामलों में औरतों को ज़बरदस्ती रिश्तों में धकेला जाता है, ताकि उनके ज़रिए परिवारों और समाज पर कंट्रोल कायम किया जा सके।
कुछ इलाकों में यह भी सामने आया है कि आतंकी संगठन अपने नेटवर्क को मज़बूत करने के लिए औरतों को एक “हथियार” की तरह इस्तेमाल करते हैं—उनकी इज़्ज़त और ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ करते हुए। यह अमल न सिर्फ़ गैर-कानूनी है बल्कि इस्लाम के नाम का भी गलत इस्तेमाल है, क्योंकि मज़हब किसी भी तरह के ज़ुल्म और ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं देता।
मक़ामी आबादी में इस मुद्दे को लेकर गहरी फिक्र पाई जा रही है। समाज के ज़िम्मेदार अफ़राद और हुकूमती इदारों से यह मांग उठ रही है कि औरतों की हिफ़ाज़त के लिए सख़्त कदम उठाए जाएं और ऐसे गुनाहगारों को कड़ी सज़ा दी जाए।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस मसले पर खुलकर बात करना, जागरूकता फैलाना और पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाना बेहद ज़रूरी है। कश्मीर की औरतें सिर्फ़ हमदर्दी नहीं, बल्कि सुरक्षा, इज़्ज़त और बराबरी का हक़ मांगती हैं।
यह वक्त है कि समाज मिलकर इस ज़ुल्म के खिलाफ़ खड़ा हो और यह पैग़ाम दे कि किसी भी नाम पर औरतों के साथ नाइंसाफ़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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