इस्लामाबाद/कराची: "बड़ी हसरत से मांगी थी इमदाद, मगर हाथ आया है सिर्फ कर्ज का बोझ।" पाकिस्तान के लिए अप्रैल का महीना किसी कयामत से कम साबित नहीं होने वाला है। मुल्क को अगले चंद दिनों में $5.3 बिलियन (करीब 530 करोड़ डॉलर) का भारी-भरकम विदेशी कर्ज चुकाना है। खजाना खाली है, विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) दम तोड़ रहे हैं और हुकूमत की पेशानी पर बल हैं।
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) के पास जो थोड़ा-बहुत 'चंदा' बचा था, वह भी इस कर्ज की भेंट चढ़ने वाला है। यूएई (UAE) को किए जाने वाले भुगतान और यूरोबॉन्ड की मैच्योरिटी ने पाकिस्तान के आर्थिक तंत्र की चूलें हिला दी हैं। जानकारों का कहना है कि अगर यही रफ्तार रही, तो पाकिस्तान को अपने रोजमर्रा के खर्चे चलाने के लिए भी दुनिया के सामने 'कासा-ए-गदाई' (भीख का कटोरा) फैलाना पड़ेगा।
इस आर्थिक तबाही ने पाकिस्तान की 'आर्थिक संप्रभुता' पर सवालिया निशान लगा दिया है। मुल्क अपनी जरूरतों के लिए अब पूरी तरह से बाहरी इमदाद और कर्ज पर निर्भर है। अवाम में इस बात को लेकर शदीद (गंभीर) गुस्सा है कि हुकूमत ने तरक्की के नाम पर सिर्फ कर्ज का पहाड़ खड़ा किया है, जिसका खामियाजा अब आम आदमी को कमरतोड़ महंगाई के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
एक तरफ कर्ज का बोझ और दूसरी तरफ घटते रिजर्व—यह पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरी को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की साख अब 'डिफॉल्टर' के करीब पहुंच चुकी है। अवाम का तंज है कि "मुल्क की माली हालत इतनी पतली है कि अब तो बैंक भी दरवाजे बंद करने की सोच रहे हैं।"
साफ है कि बिना किसी ठोस आर्थिक सुधार के पाकिस्तान का इस दलदल से निकलना नामुमकिन है। अप्रैल का यह कर्ज अदायगी सिर्फ एक ट्रेलर है, पूरी फिल्म अभी बाकी है। अगर यही हाल रहा, तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का 'दीवाला' निकलना महज वक्त की बात है।

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