क्वेटा/इस्लामाबाद: पाकिस्तान का दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलोचिस्तान इस वक्त भीषण सुरक्षा संकट के दौर से गुजर रहा है। हाल ही में जारी 'सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज' (CRSS) की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रांत में हिंसा की घटनाओं में 104% का चौंकाने वाला उछाल देखा गया है। आंकड़ों के अनुसार, इस हिंसा में मरने वालों की संख्या 217 से बढ़कर 443 हो गई है, जो पिछले 13 वर्षों में सबसे अधिक है।
रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि विद्रोही गुट और प्रतिबंधित संगठन अब पहले से कहीं अधिक घातक और सटीक हमले कर रहे हैं। हमलों में आधुनिक हथियारों, विस्फोटकों और ड्रोन तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। बलोचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा इस वक्त देश के सबसे बड़े 'फ्लैशपॉइंट' बने हुए हैं, जहाँ देश की कुल मौतों का लगभग 55% हिस्सा दर्ज किया गया है।
सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और बलोच अलगाववादी संगठनों की बढ़ती सक्रियता मुल्क की आंतरिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है। सरकार और सुरक्षा बलों के तमाम दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर हिंसा का ग्राफ कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है, जिससे आम शहरी और सुरक्षाकर्मी दोनों ही निशाने पर हैं।
एक तरफ आंतरिक हिंसा बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सफाई देनी पड़ रही है। हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की भूमिका को लेकर जो चर्चाएं हुई थीं, उस पर ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की इस युद्ध में कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा कि बाहरी शक्तियों का ध्यान केवल तेल की कीमतों और अपने हितों तक सीमित है।
बढ़ती हिंसा और आर्थिक बदहाली के बीच पाकिस्तान एक दोराहे पर खड़ा है। यदि बलोचिस्तान में फैलते इस असंतोष और सुरक्षा खामियों को समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह न केवल देश की अखंडता बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है।

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