कश्मीर के बेटे मोमिन अली मलिक ने वुशु में जीता गोल्ड, गंदरबल की धरती से पूरे वादी को दिया कामयाबी का पैगाम


कश्मीर की वादियों में हुनर की कमी नहीं है, जरूरत है तो बस उस हुनर को सही मौका, मेहनत और हौसले के साथ आगे बढ़ाने की। गंदरबल से आई एक शानदार खेल खबर ने इस बात को एक बार फिर साबित कर दिया है। जम्मू-कश्मीर के होनहार खिलाड़ी मोमिन अली मलिक ने 70वें नेशनल स्कूल गेम्स 2026 की वुशु प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतकर न सिर्फ अपने परिवार और इलाके का नाम रोशन किया, बल्कि पूरी कश्मीर घाटी के नौजवानों के लिए उम्मीद और प्रेरणा की एक नई मिसाल कायम की है। मोमिन की यह कामयाबी हर उस नौजवान के लिए एक पैगाम है, जिसके दिल में कुछ बड़ा करने का ख्वाब है और जो अपने हुनर के दम पर दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहता है।

गंदरबल के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन में आयोजित 70वें नेशनल स्कूल गेम्स की वुशु प्रतियोगिताएं रविवार को पांच दिनों के रोमांचक मुकाबलों के बाद संपन्न हुईं। इस राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया।। इतने बड़े मंच पर अलग-अलग इलाकों से आए खिलाड़ियों के बीच मुकाबला करना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं होता। हर खिलाड़ी अपने साथ वर्षों की मेहनत, अपने कोच की ट्रेनिंग और अपने परिवार की उम्मीदें लेकर मैदान में उतरता है। ऐसे कड़े मुकाबलों के बीच मोमिन अली मलिक ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाते हुए फाइनल में महाराष्ट्र के अविनाश पाटिल को शिकस्त दी और गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।

मोमिन की इस जीत को सिर्फ एक मेडल की कामयाबी समझना इस उपलब्धि की अहमियत को कम करना होगा। यह उस मेहनत का नतीजा है, जो अक्सर मैदान में दिखाई देती है, मगर जिसके पीछे सुबह की प्रैक्टिस, थकान, अनुशासन, मुश्किलों का सामना और लगातार खुद को बेहतर बनाने का जज्बा छिपा होता है। खेल के मैदान में जीत उसी की होती है, जो अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन पर काम करता है और हार के डर से अपने कदम पीछे नहीं खींचता। मोमिन की कामयाबी कश्मीर के नौजवानों को यही सिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत में कोई कमी न रखी जाए, तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता जरूर निकलता है।

इस प्रतियोगिता में जम्मू-कश्मीर ने कुल एक गोल्ड, दो सिल्वर और पांच ब्रॉन्ज मेडल हासिल किए। यह प्रदर्शन बताता है कि वादी और जम्मू के युवाओं में खेलों के क्षेत्र में आगे बढ़ने की भरपूर क्षमता मौजूद है। जरूरत इस बात की है कि इस क्षमता को पहचानकर उसे बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक खेल सुविधाओं, योग्य कोच और नियमित प्रतियोगिताओं का सहारा दिया जाए। जब किसी गांव या कस्बे का बच्चा राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतता है, तो वह अपने साथ सैकड़ों दूसरे बच्चों के दिलों में भी उम्मीद जगाता है। वे सोचने लगते हैं कि अगर हमारा हमसाया, हमारे इलाके का लड़का इतना बड़ा मुकाम हासिल कर सकता है, तो हम भी क्यों नहीं?

गंदरबल में राष्ट्रीय स्तर की वुशु प्रतियोगिता का आयोजन भी अपने आप में अहमियत रखता है। इससे जम्मू-कश्मीर को देश के खेल नक्शे पर अपनी पहचान मजबूत करने का मौका मिला। ऐसे आयोजन स्थानीय खिलाड़ियों को बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर देते हैं और दूसरे राज्यों के खिलाड़ियों के साथ अनुभव साझा करने का रास्ता खोलते हैं। इससे खेल संस्कृति को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय युवाओं को यह एहसास होता है कि उनकी प्रतिभा भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल कर सकती है।

आज कश्मीर के नौजवानों के सामने सबसे बड़ी जरूरत है कि वे अपने वक्त, अपनी ताकत और अपनी काबिलियत को सही दिशा में लगाएं। शिक्षा के साथ खेल, तकनीकी हुनर और नेतृत्व की क्षमता भी तरक्की के जरूरी हिस्से हैं। खेल इंसान को सिर्फ जीतना नहीं सिखाते, बल्कि हार को बर्दाश्त करना, अपने साथी का सम्मान करना, नियमों की पाबंदी करना और मुश्किल हालात में सही फैसला लेना भी सिखाते हैं। यही खूबियां आगे चलकर एक जिम्मेदार खिलाड़ी, बेहतर नागरिक और मजबूत लीडर तैयार करती हैं।

मोमिन अली मलिक की जीत से माता-पिता और समाज को भी एक अहम सबक मिलता है। बच्चों के ख्वाबों को समझना, उनकी दिलचस्पी को पहचानना और उन्हें आगे बढ़ने का हौसला देना बहुत जरूरी है। हर बच्चा एक जैसा नहीं होता। किसी का हुनर पढ़ाई में निखरता है, कोई खेलों में चमकता है, तो कोई कला, विज्ञान या तकनीक में अपनी पहचान बनाता है। अगर परिवार, स्कूल और समाज मिलकर बच्चों की हौसला-अफजाई करें, तो यही बच्चे आने वाले वक्त में जम्मू-कश्मीर का नाम रोशन कर सकते हैं।

कश्मीर की असल ताकत यहां के लोगों की मेहनत, मेहमाननवाजी, हिम्मत और मुश्किल हालात में भी आगे बढ़ने की जिद में है। अब जरूरत है कि इस ताकत को नए अवसरों में बदला जाए। गांव-गांव में खेलों को बढ़ावा दिया जाए, स्कूलों में प्रतिभाओं की पहचान हो और मेहनती खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए जरूरी सुविधाएं मिलें। स्थानीय संस्थानों, खेल संगठनों और समाज को मिलकर ऐसा माहौल तैयार करना चाहिए, जहां किसी प्रतिभाशाली बच्चे का सपना केवल संसाधनों की कमी के कारण अधूरा न रह जाए।

मोमिन अली मलिक का गोल्ड मेडल पूरी वादी के लिए खुशी और फख्र का मौका है। उनकी कामयाबी हर नौजवान से कहती है कि अपने ख्वाबों को छोटा मत समझो, अपनी मेहनत पर भरोसा रखो और मंजिल तक पहुंचने के लिए लगातार कोशिश करते रहो। आज मोमिन ने वुशु के मैदान में तिरंगे और जम्मू-कश्मीर का मान बढ़ाया है, कल कोई दूसरा नौजवान किसी और खेल, विज्ञान, शिक्षा या कारोबार में नई मिसाल कायम कर सकता है।

यही वक्त है कि कश्मीर का हर नौजवान अपने अंदर छिपे हुनर को पहचाने, अपनी मेहनत को अपनी पहचान बनाए और अपने इलाके की तरक्की में हिस्सा डाले। क्योंकि जब एक नौजवान कामयाब होता है, तो सिर्फ एक परिवार नहीं, बल्कि पूरे समाज की उम्मीदें बुलंद होती हैं। मोमिन की जीत का असल पैगाम यही है—हौसला रखो, मेहनत करो और अपने कश्मीर का नाम रोशन करो।

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