पेशावर: पाकिस्तान के सूबा ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में PTI की क़ियादत वाली सूबाई हुकूमत को हटाए जाने और इमरजेंसी व गवर्नर राज के हालात के बाद पुलिस अहलकारों और सरकारी मुलाज़मीन के बीच बेचैनी बढ़ने की ख़बरें सामने आ रही हैं।
इस सूरतेहाल ने सूबे के सरकारी निज़ाम के अंदरूनी दबाव को उजागर किया है। जिस पुलिस फ़ोर्स और सरकारी मशीनरी पर निज़ाम को लागू करने की ज़िम्मेदारी होती है, उसी के अंदर अब तनाव और बेयक़ीनी की कैफ़ियत पैदा होने की बात कही जा रही है।
इस पूरे मामले का एक अहम पहलू यह है कि चुनी हुई हुकूमत को हटाए जाने के बाद पैदा होने वाली नाराज़गी सिर्फ़ सड़कों तक महदूद नहीं रह सकती, बल्कि इसका असर सरकारी इदारों और मुलाज़मीन पर भी पड़ सकता है। पुलिस अहलकारों और सिविल मुलाज़मीन के बीच बेचैनी की ख़बरें इस बात की तरफ़ इशारा करती हैं कि सियासी फ़ैसलों के असरात सरकारी मशीनरी के अंदर भी महसूस किए जा सकते हैं।
ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पैदा होने वाली यह सूरतेहाल पाकिस्तान में सियासी स्थिरता, जम्हूरी अमल और सरकारी इदारों की भूमिका को लेकर नए सवाल खड़े करती है। किसी चुनी हुई हुकूमत को हटाने के बाद अगर सरकारी मुलाज़मीन और कानून लागू करने वाले इदारों के अंदर भी तनाव बढ़ता है, तो इससे निज़ाम के लिए चुनौतियां और पेचीदा हो सकती हैं।
फ़िलहाल, इस मामले में पुलिस और सरकारी मुलाज़मीन के बीच बेचैनी की हद और उसके मुस्तक़बिल असरात को समझने के लिए मजीद तफ़सील और तस्दीक़शुदा मालूमात की ज़रूरत है।


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