पाकिस्तान के राजनीतिक और सुरक्षा मामलों पर टिप्पणी करने वाले कमेंटेटर मोईद पीरजादा ने देश की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की मौजूदा भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। पीरजादा के मुताबिक, अमेरिका की CIA और भारत की RAW जैसी खुफिया एजेंसियां पेशेवर संस्थानों के तौर पर काम करती हैं, जबकि पाकिस्तान की ISI ने अपनी मेरिट, विजन और संस्थागत स्वतंत्रता को काफी हद तक खो दिया है।
पीरजादा ने दावा किया कि ISI अब एक स्वतंत्र और पेशेवर खुफिया संस्था के बजाय पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के हाथों में एक औजार की तरह इस्तेमाल हो रही है। उनके इस बयान ने पाकिस्तान में सेना और खुफिया तंत्र के बीच रिश्तों को लेकर चल रही पुरानी बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है।
उनकी टिप्पणी का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने सिर्फ ISI की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि पाकिस्तान में सैन्य नेतृत्व के बढ़ते प्रभाव और सत्ता के व्यक्तिगत केंद्रीकरण की तरफ भी इशारा किया। पीरजादा की बातों से यह सवाल उठता है कि मुल्क की खुफिया संस्थाएं क्या राष्ट्रीय हित और संस्थागत नीति के मुताबिक काम कर रही हैं या फिर उनका इस्तेमाल मौजूदा सैन्य नेतृत्व की राजनीतिक और रणनीतिक जरूरतों के लिए किया जा रहा है।
पाकिस्तान में ISI लंबे समय से देश की सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों और क्षेत्रीय रणनीति में एक अहम भूमिका निभाती रही है। मगर इसके साथ ही एजेंसी पर राजनीतिक मामलों में दखल, विपक्षी नेताओं पर दबाव और सैन्य प्रतिष्ठान के हितों को आगे बढ़ाने जैसे आरोप भी लगते रहे हैं। ऐसे में पीरजादा की टिप्पणी पाकिस्तान के भीतर से आने वाली उस आलोचना को दिखाती है, जिसमें संस्थाओं की स्वायत्तता और पेशेवर क्षमता को लेकर चिंता जताई जा रही है।
विश्लेषकों के नजरिए से देखें तो किसी भी मुल्क की खुफिया एजेंसी की ताकत सिर्फ उसके ऑपरेशनल नेटवर्क में नहीं होती, बल्कि उसकी संस्थागत विश्वसनीयता, पेशेवर मेरिट और राजनीतिक निष्पक्षता में भी होती है। अगर खुफिया तंत्र किसी एक व्यक्ति या संस्थान के प्रभाव में ज्यादा आ जाए, तो इससे उसकी निर्णय लेने की क्षमता और सार्वजनिक भरोसे पर असर पड़ सकता है।
पीरजादा के बयान ने पाकिस्तान के अंदर सेना की भूमिका और सिविल-सैन्य संबंधों पर नई बहस को हवा दी है। खासकर असीम मुनीर के नेतृत्व में सैन्य प्रतिष्ठान की बढ़ती ताकत के बीच, यह आलोचना इस बात की तरफ इशारा करती है कि पाकिस्तान में राज्य संस्थाओं की स्वतंत्रता और सत्ता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ने लगा हैं।

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