सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, LeT के कैडरों को भविष्य में होने वाले हमलों की सार्वजनिक रूप से जिम्मेदारी नहीं लेने के निर्देश दिए जाने की जानकारी है। इससे हमले के पीछे मौजूद वास्तविक संगठन की पहचान छिपाने और किसी दूसरे आतंकी संगठन को जिम्मेदार ठहराने की रणनीति अपनाए जाने की आशंका बढ़ी है। एजेंसियों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था आतंकियों को सीधे तौर पर किसी संगठन से जोड़ने वाली जांच को शुरुआती स्तर पर ही जटिल बना सकती है।
इनपुट में यह भी सामने आया है कि ISI जम्मू-कश्मीर में अपने आतंकी ढांचे को नए सिरे से सक्रिय करने के लिए नए ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) और स्थानीय संपर्कों का नेटवर्क तैयार करने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के आसपास LeT और ISKP से जुड़े तत्वों के बीच कथित संयुक्त प्रशिक्षण गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है। सुरक्षा एजेंसियां इस नेटवर्क को जम्मू-कश्मीर में संभावित आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार किए जा रहे व्यापक तंत्र के हिस्से के तौर पर देख रही हैं।
इस रणनीति का एक अहम पहलू डिजिटल प्रोपेगेंडा भी बताया जा रहा है। किसी हमले को ISKP से जोड़ने की कोशिश के जरिए इस संगठन की जम्मू-कश्मीर में मौजूदगी और प्रभाव को वास्तविक स्थिति से अधिक बड़ा दिखाया जा सकता है। इससे सोशल मीडिया पर भ्रम पैदा करने के साथ-साथ जांच एजेंसियों का ध्यान वास्तविक हमलावर संगठन से हटाने का प्रयास किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर में इससे पहले भी आतंकी संगठनों की वास्तविक पहचान छिपाने के लिए अलग-अलग फ्रंट संगठनों और नए नामों का इस्तेमाल सामने आता रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के मुताबिक, अब कथित तौर पर संगठन के नाम और जिम्मेदारी के बीच अंतर पैदा करने की कोशिश की जा रही है, ताकि हमले को अंजाम देने वाले कैडरों और उसके पीछे मौजूद नेटवर्क के बीच सीधा संबंध स्थापित करना मुश्किल हो।
सुरक्षा दृष्टि से यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई केवल हमले के बाद सामने आने वाले दावे तक सीमित नहीं रह सकती। किसी घटना की वास्तविक तस्वीर सामने लाने के लिए आतंकियों के सीमा पार संपर्क, प्रशिक्षण, वित्तीय नेटवर्क, स्थानीय सहयोगियों, संचार माध्यमों और डिजिटल गतिविधियों की भी जांच जरूरी होगी।
सुरक्षा एजेंसियों का यह आकलन सामने आने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकी नेटवर्क की पहचान और उनके पीछे मौजूद संरचनाओं पर निगरानी और मजबूत किए जाने की आवश्यकता रेखांकित होती है। कथित तौर पर LeT के हमलों को ISKP के नाम पर पेश करने की यह रणनीति सामने आती है तो यह पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद को प्रॉक्सी, डिनायबिलिटी और भ्रामक नैरेटिव के जरिए संचालित करने की कोशिश का एक और उदाहरण होगी।

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