बलूचिस्तान में राजनीतिक असंतोष, जबरन गुमशुदगियों और कथित राज्य दमन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। बलूच नेता सरदार अख्तर जान मेंगल ने अपने भाषण में बताया कि राज्य दमन, कथित राज्य आतंकवाद, क्षत-विक्षत शवों की बरामदगी, जबरन गुमशुदगियां तथा बलूचिस्तान के तट और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण जैसी कार्रवाइयों में पाकिस्तानी राज्य, सैन्य प्रतिष्ठान और उससे जुड़े संस्थानों की भूमिका रही है। बलूचिस्तान में दशकों से चले आ रहे राजनीतिक संघर्ष और स्वतंत्रता की मांग को फिर चर्चा में ला दिया है।
बलूचिस्तान का मौजूदा संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। पाकिस्तान के गठन के बाद 1948 में कलात के पाकिस्तान में विलय के मुद्दे पर ही पहला सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ। इसके बाद 1950 और 1960 के दशकों में प्रांतीय स्वायत्तता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को लेकर असंतोष बढ़ता गया। 1970 में One Unit व्यवस्था समाप्त होने के बाद बलूचिस्तान को पाकिस्तान का एक अलग प्रांत बनाया गया, लेकिन केंद्र और बलूच राजनीतिक शक्तियों के बीच अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
बलूचिस्तान खुद को एक अलग देश के रूप में देखता है, जबकि पाकिस्तान की नजर में यह उसका एक बड़ा प्रांत है। और गैस, तांबा, सोना, कोयला तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों से बेहद समृद्ध माना जाता है। इसके बावजूद स्थानीय आबादी के एक हिस्से में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि इन संसाधनों से होने वाले आर्थिक लाभ का पर्याप्त हिस्सा स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंचता। ग्वादर और अरब सागर का तट इस विवाद को और संवेदनशील बनाता है। CPEC और ग्वादर बंदरगाह जैसी परियोजनाओं ने बलूचिस्तान की रणनीतिक और आर्थिक अहमियत को और बढ़ाया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर रोजगार, विस्थापन और जमीन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को लेकर शिकायतें भी लगातार सामने आती रही हैं।
बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी सबसे गंभीर मुद्दों में शामिल है। मानवाधिकार संगठनों और पीड़ित परिवारों का आरोप है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और अन्य लोगों को हिरासत में लिए जाने के बाद उनके बारे में लंबे समय तक जानकारी नहीं मिलती। मार्च 2026 की एक मानवाधिकार रिपोर्ट में उस महीने 65 कथित जबरन गुमशुदगियों का दावा किया गया। दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान अपने अभियानों को आतंकवाद और सशस्त्र उग्रवाद से मुकाबले के लिए आवश्यक बताते हैं।
इसी पृष्ठभूमि में स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग को समझना जरूरी है। बलूच राष्ट्रवादी और अलगाववादी संगठन लंबे समय से पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र बलूच राष्ट्र की मांग करते रहे हैं। विभिन्न स्वतंत्रता समर्थक समूह अपने आंदोलन को बलूच लोगों के राजनीतिक अधिकार, संसाधनों पर नियंत्रण और आत्मनिर्णय के सवाल से जोड़ते हैं। हालांकि वर्तमान में बलूचिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का ही हिस्सा और उसका एक प्रांत है; स्वतंत्रता की मांग एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में मौजूद है।
बलूच स्वतंत्रता समर्थक समूहों द्वारा 11 अगस्त को ‘बलूच स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में भी मानते है। यह तारीख 1947 में कलात की स्वतंत्रता की घोषणा से जुड़ी बलूच राष्ट्रवादी व्याख्या का प्रतीक है। बलूच राष्ट्रवादी इसे अपने ऐतिहासिक राजनीतिक अस्तित्व और आत्मनिर्णय की मांग से जोड़ते हैं, जबकि पाकिस्तान का आधिकारिक दृष्टिकोण इससे अलग है।
सरदार अख्तर जान मेंगल जैसे प्रमुख बलूच राजनीतिक नेता द्वारा राज्य दमन, गुमशुदगियों और संसाधनों पर नियंत्रण के आरोप उठाए जाने से यह बहस फिर तेज हुई है कि बलूचिस्तान की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था या सैन्य अभियान के नजरिए से देखा जा सकता है या नहीं।
क्योंकि जब किसी क्षेत्र की जनता में यह भावना गहरी हो जाए कि उसके संसाधनों, पहचान और राजनीतिक अधिकारों पर उसका पर्याप्त नियंत्रण नहीं है, तो असंतोष केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं रहता—वह आने वाली पीढ़ियों के लिए पहचान और आत्मनिर्णय का सवाल बन जाता है।

0 टिप्पणियाँ