जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में तालीम के मैदान में आर्मी गुडविल स्कूल्स ने पिछले कई बरसों में अपनी एक अलग पहचान कायम की है। इन स्कूलों की मकबूलियत सिर्फ इस वजह से नहीं है कि यहां बच्चों को अच्छी तालीम मिलती है, बल्कि इसलिए भी कि इन संस्थानों में अकादमिक पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों की शख्सियत, हुनर और मुस्तकबिल को भी बराबर अहमियत दी जाती है। आज जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में ऐसे 43 आर्मी गुडविल स्कूल काम कर रहे हैं, जिनमें तकरीबन 17 हजार विद्यार्थी तालीम हासिल कर रहे हैं।

इन स्कूलों का बुनियादी मकसद बच्चों को ऐसा तालीमी माहौल फराहम करना है, जहां वे किताबों तक महदूद न रहें, बल्कि अपनी सलाहियतों को मुख्तलिफ शोबों में आजमा सकें। यहां एक मुतवाज़िन करिकुलम पर जोर दिया जाता है, जिसमें साइंस और अकादमिक पढ़ाई के साथ-साथ आउटडोर एक्टिविटीज, खेल और दूसरी गैर-नसाबी सरगर्मियों को भी जगह दी गई है। स्कूलों में साइंस लैबोरेटरी, कंप्यूटर जैसी आधुनिक सहूलियतें और खेलों के लिए जरूरी इंतजाम बच्चों को आज के दौर की जरूरतों के मुताबिक तैयार करने में मदद करते हैं।

कश्मीर के बच्चों के लिए ऐसी तालीमी सहूलियतों की अहमियत और भी ज्यादा है। लंबे समय तक इस इलाके ने अशांति और मुश्किल हालात का सामना किया है। ऐसे माहौल में बच्चों की तालीम को बरकरार रखना और उन्हें बेहतर मुस्तकबिल की तरफ ले जाना एक बड़ी जिम्मेदारी रही है। आर्मी गुडविल स्कूल्स ने इसी जरूरत को सामने रखते हुए तालीम को अपनी गुडविल और कम्युनिटी आउटरीच का एक अहम जरिया बनाया।

इन स्कूलों की कामयाबी का एक अहम पहलू अवामी भरोसा भी है। अतीत में इन संस्थानों को निशाना बनाने और इनके काम में रुकावट डालने की कोशिशों के बावजूद, स्थानीय लोगों की तरफ से इन स्कूलों को मिलने वाली हिमायत इस बात की निशानदेही करती है कि अवाम अपने बच्चों के लिए बेहतर तालीम और महफूज माहौल को कितनी अहमियत देते हैं। वालिदैन के लिए बच्चों की पढ़ाई, तरबियत और मुस्तकबिल सबसे बड़ी फिक्र है, और इसी वजह से अच्छे तालीमी इदारों की मांग लगातार बनी हुई है।

आर्मी गुडविल स्कूल्स का एक और अहम पहलू यह है कि यहां से निकलने वाले बच्चे सिर्फ इम्तिहान पास करने के लिए तैयार नहीं होते, बल्कि उनमें मुकाबले का जज्बा, जिम्मेदारी का एहसास और समाज के लिए कुछ करने की सोच पैदा करने की कोशिश की जाती है। खेल, कंप्यूटर, साइंस और दूसरी सरगर्मियों के जरिए उन्हें बदलती दुनिया के साथ कदम मिलाने का मौका मिलता है।

कश्मीर में तालीम सिर्फ किताब और क्लासरूम का मामला नहीं, बल्कि आने वाली नस्ल के ख्वाबों और उम्मीदों से जुड़ा मसला है। इसी लिहाज से आर्मी गुडविल स्कूल्स की मौजूदगी को एक ऐसे तालीमी मॉडल के तौर पर देखा जा सकता है, जहां तालीम, हुनर और तरक्की एक साथ आगे बढ़ते हैं। 43 स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 17 हजार बच्चे इस सफर की तस्वीर पेश करते हैं और यह दिखाते हैं कि जब तालीम को सही सहूलियत, लगातार मेहनत और भरोसे का माहौल मिलता है, तो कश्मीर के नौजवानों के लिए मुस्तकबिल के नए दरवाजे खुल सकते हैं।