कश्मीर की खूबसूरत वादियों में आज महिलाएं सिर्फ अपने हुनर को संजो नहीं रहीं बल्कि उसी हुनर को अपनी आर्थिक ताकत का जरिया भी बना रही हैं। कुपवाड़ा की Flag Women of Kupwara (FLWOK) पहल, जो अप्रैल 2022 में भारतीय सेना के सहयोग से शुरू हुई थी, इसका एक शानदार उदाहरण है। यह पहल अब महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता, सम्मान और राष्ट्रसेवा की एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी है।
FLWOK के तहत कुपवाड़ा में अब 12 Skill Development Centres संचालित हो रहे हैं जहां करीब 140 महिलाएं काम कर रही हैं। इन केंद्रों में महिलाएं सदियों पुरानी कश्मीरी कला क्रूएल कढ़ाई को आधुनिक जरूरतों से जोड़ते हुए हाथ से बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज तैयार करती हैं। इन झंडों की खासियत सिर्फ उनके रंग और आकार में नहीं बल्कि उनमें महिलाओं के हाथों से की गई बारीक कढ़ाई में भी है। खास तौर पर अशोक चक्र को हाथ से सिलना इन झंडों को एक अलग पहचान देता है।
इन महिलाओं ने अपनी मेहनत और हुनर से बड़े स्तर पर ऑर्डर पूरे किए हैं। हर घर तिरंगा अभियान के लिए 4,500 राष्ट्रीय ध्वज तैयार करना उनके कौशल और संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण है। हर झंडे के पीछे मशीन की तेज गति नहीं बल्कि एक महिला के हाथों की मेहनत, धैर्य और देश के प्रति सम्मान जुड़ा हुआ है।
इस पहल की एक खास बात यह भी है कि यहां महिलाओं को सिर्फ सिलाई-कढ़ाई नहीं सिखाई जाती, बल्कि उन्हें डिज़ाइनिंग, क्वालिटी कंट्रोल, पैकेजिंग और समय प्रबंधन जैसी आधुनिक स्किल्स भी दी जाती हैं। इससे वे केवल कारीगर नहीं बल्कि एक संगठित उत्पादन प्रणाली का हिस्सा बन रही हैं। कई महिलाएं जो पहले घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, आज अपने परिवार की आय में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
यह पहल कई स्तरों पर बदलाव की कहानी लिख रही है। एक ओर यह महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बना रही है वहीं दूसरी ओर कश्मीर की पारंपरिक क्रूएल कढ़ाई को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी कर रही है। इससे स्थानीय शिल्प केवल घरों तक सीमित रहने के बजाय रोजगार और बाजार से जुड़ रहा है। कई महिलाओं ने बताया है कि अब वे अपने बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्च में खुद योगदान दे पा रही हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
FLWOK की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहां रोजगार, परंपरा और राष्ट्रभक्ति एक साथ दिखाई देते हैं। तिरंगे के हर धागे में कश्मीरी हुनर की पहचान और देश के प्रति सम्मान की भावना बुनी जा रही है। यह सिर्फ एक उत्पाद नहीं बल्कि भावनाओं और पहचान का प्रतीक बन चुका है।
भारतीय सेना की भूमिका भी इस पहल को विशेष बनाती है। शांतिपूर्ण और विकसित कश्मीर की दिशा में सेना केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं बल्कि स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर सतत आजीविका, कौशल विकास और अवसरों के निर्माण में भी योगदान दे रही है। इससे सेना और स्थानीय लोगों के बीच विश्वास और सहयोग की एक मजबूत कड़ी बनी है।
कुपवाड़ा की ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि जब हुनर को अवसर मिलता है तो हाथों की कढ़ाई सिर्फ कपड़े को नहीं सजाती—वह परिवारों का भविष्य, महिलाओं का आत्मविश्वास और राष्ट्र की उम्मीदें भी बुनती है।

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