बयान में बुरहान वानी को एक "शहीद" और "फ़्रंटलाइन रेज़िस्टेंस फ़ाइटर" के तौर पर पेश किया गया, जबकि वह एक नामज़द आतंकी था, जो हिंसक गतिविधियों और आतंकवाद से जुड़ा हुआ था। सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि इस तरह की ज़बान और बयानबाज़ी का मक़सद वास्तविक तथ्यों को छिपाकर आतंकवाद को वैचारिक समर्थन देना और युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलना है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे बयान यह साबित करते हैं कि सीमा पार बैठे पाकिस्तान समर्थित नेटवर्क अब भी प्रॉक्सी संगठनों के ज़रिये घाटी के नौजवानों को कट्टरपंथ की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। बयान में युवाओं से तथाकथित "हथियारबंद संघर्ष" जारी रखने की अपील भी की गई, जिसे सुरक्षा विशेषज्ञ बेहद चिंताजनक मानते हैं। उनका कहना है कि यह सीधे तौर पर युवाओं को हिंसा के लिए उकसाने और क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का प्रयास है।
विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था, विकास परियोजनाओं, शिक्षा, खेल, पर्यटन और रोज़गार के नए अवसरों ने बड़ी संख्या में युवाओं को सकारात्मक दिशा दी है। ऐसे में आतंक समर्थक संगठन इस बदलते माहौल से परेशान दिखाई देते हैं और भ्रामक प्रचार के ज़रिये पुराने हिंसक नैरेटिव को दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
सुरक्षा मामलों से जुड़े जानकारों का कहना है कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म अब ऐसे संगठनों के लिए सबसे बड़ा माध्यम बन चुके हैं, जहाँ भावनात्मक नारों और झूठे प्रचार के सहारे युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। इसी वजह से समाज, परिवार और शिक्षण संस्थानों की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे युवाओं को सही जानकारी दें और उन्हें कट्टरपंथी प्रचार से दूर रखें।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि कश्मीर के नौजवान आज शिक्षा, कारोबार, खेल, पर्यटन और तकनीकी क्षेत्रों में नई पहचान बना रहे हैं। ऐसे में आतंकवाद का महिमामंडन करने वाले संदेश न केवल युवाओं के भविष्य के लिए नुकसानदेह हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के अमन और तरक़्क़ी के ख़िलाफ़ भी हैं।
जानकारों का कहना है कि इस तरह के बयान पाकिस्तान समर्थित प्रॉक्सी नेटवर्क की उस रणनीति को उजागर करते हैं, जिसके तहत आतंकवाद को वैचारिक रूप से ज़िंदा रखने की कोशिश की जाती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की बड़ी तादाद अमन, तरक़्क़ी और स्थायी ख़ुशहाली की राह पर आगे बढ़ना चाहती है। यही वजह है कि हिंसा और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली अपीलों को आम लोगों के बीच व्यापक समर्थन नहीं मिल रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकवाद का महिमामंडन करने वाले ऐसे बयानों को गंभीरता से समझना और उनके पीछे छिपी कट्टरपंथी सोच को बेनक़ाब करना बेहद ज़रूरी है, ताकि समाज में शांति, भाईचारे और विकास का माहौल मज़बूत बना रहे तथा नौजवानों को हिंसा के बजाय शिक्षा, रोज़गार और बेहतर भविष्य की राह पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सके।


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