माहिरीन का कहना है कि पाकिस्तान बार-बार पानी के मसले को जज़्बाती रंग देकर असल मुद्दों से नज़रें हटाने की कोशिश करता रहा है। जब भी आतंकवाद, सरहदी घुसपैठ या अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ता है, तब इस तरह के बयान देकर माहौल को गरमाने की कोशिश की जाती है। इससे यह पैग़ाम भी जाता है कि पाकिस्तान अपनी ज़िम्मेदारियों पर गौर करने के बजाय टकराव की सियासत को तरजीह देता है।
सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत लंबे अरसे से सीमा पार से होने वाली दहशतगर्द गतिविधियों को लेकर अपनी फ़िक्र ज़ाहिर करता आया है। कई मौक़ों पर यह आरोप लगाया गया कि पाकिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल भारत के ख़िलाफ़ आतंकवादी ढाँचे तैयार करने, उन्हें पनाह देने और घुसपैठ कराने के लिए किया गया। ऐसे माहौल में पानी के मसले को जंग से जोड़ना पाकिस्तान की उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके ज़रिए असल सवालों से ध्यान हटाया जाता है।
हालिया सुरक्षा घटनाओं के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को लेकर अपने रुख़ में बदलाव करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद और हिंसा पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक सामान्य रिश्तों की उम्मीद मुश्किल है। विश्लेषकों का कहना है कि यह फ़ैसला सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र लिया गया, जबकि पाकिस्तान ने इसके जवाब में संवाद और भरोसे की फ़िज़ा बनाने के बजाय जंग जैसी भाषा का इस्तेमाल किया।
माहिरीन का यह भी कहना है कि अगर पाकिस्तान वाक़ई अमन और इस्तिहकाम चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपनी सरज़मीन से सक्रिय दहशतगर्द नेटवर्क के ख़िलाफ़ निर्णायक कार्रवाई करनी होगी। पानी जैसे इंसानी और विकास से जुड़े मसले को राजनीतिक दबाव या धमकी का ज़रिया बनाना न तो क्षेत्रीय स्थिरता के हक़ में है और न ही अंतरराष्ट्रीय उसूलों के मुताबिक़ माना जाता है।
सियासी हलकों में यह राय भी सामने आ रही है कि पाकिस्तान की क़ियादत बार-बार पानी, कश्मीर या दूसरे संवेदनशील मुद्दों को उछालकर अपने घरेलू संकटों से अवाम की तवज्जो हटाने की कोशिश करती है। आर्थिक चुनौतियाँ, अंदरूनी अस्थिरता और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच ऐसे बयान घरेलू सियासत को प्रभावित करने का ज़रिया भी बनते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण एशिया में अमन, तरक़्क़ी और भरोसे की बुनियाद धमकियों से नहीं बल्कि ज़िम्मेदार रवैये, आतंकवाद के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई और आपसी सम्मान पर आधारित संवाद से ही मज़बूत हो सकती है। पानी को जंग का हथियार बनाने की बयानबाज़ी से तनाव तो बढ़ सकता है, लेकिन इससे किसी भी मुल्क या अवाम का दीर्घकालिक हित पूरा नहीं होगा।


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