सिंधु जल संधि विवाद में पाकिस्तान की बढ़ी मुश्किलें, अंतरराष्ट्रीय दांव पड़ा महंगा


पाकिस्तान की एक और कूटनीतिक कोशिश अब उसी के लिए भारी पड़ती दिखाई दे रही है। सिंधु जल संधि को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को घेरने की उसकी रणनीति अपेक्षित परिणाम देने में नाकाम रही है। अब हालात यह हैं कि मध्यस्थता की पूरी कानूनी प्रक्रिया का खर्च पाकिस्तान को अकेले उठाना पड़ रहा है, जबकि भारत ने इस प्रक्रिया को मान्यता देने से साफ़ इनकार कर दिया है।

जानकारों का कहना है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के फैसले के पश्चात पाकिस्तान ने मामले को हेग स्थित मध्यस्थता मंच तक ले जाकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश की। मगर यह दांव उसके हक़ में जाता नज़र नहीं आया। भारत ने शुरू से ही इस प्रक्रिया को स्वीकार करने से इनकार करते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह न तो इस मंच की वैधता को मानता है और न ही इससे जुड़ी किसी कानूनी कार्यवाही में भाग लेगा।

इस फैसले के बाद मध्यस्थता की पूरी लागत पाकिस्तान के कंधों पर आ गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अब तक इस कानूनी प्रक्रिया पर छह लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि खर्च हो चुकी है और आगे भी यह खर्च बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। दूसरी तरफ़ भारत ने इस पूरी प्रक्रिया पर एक भी रुपया खर्च नहीं किया है।

माहिरों का कहना है कि इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान की कूटनीतिक रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस कोशिश के ज़रिए वह भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना चाहता था, वही अब उसके लिए आर्थिक बोझ और सियासी परेशानी का सबब बनती दिखाई दे रही है। विश्लेषकों का मानना है कि बिना व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन के किसी विवाद को वैश्विक मंच पर ले जाना पाकिस्तान के लिए उल्टा साबित हुआ है।

सियासी जानकारों के मुताबिक इस पूरे मामले ने पाकिस्तान की विदेश नीति की सीमाओं को भी उजागर किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस प्रकार की सहानुभूति और समर्थन की उम्मीद इस्लामाबाद कर रहा था, वह उसे हासिल नहीं हो सका। नतीजतन उसे न केवल बढ़ते कानूनी खर्च का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

उधर भारत अपने रुख़ पर क़ायम है। नई दिल्ली का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पार आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत ने यह स्पष्ट किया है कि आतंकवाद और द्विपक्षीय समझौतों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता और देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

माहिरों का मानना है कि यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए एक अहम सबक़ भी माना जा रहा है। केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा लेकर रणनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश तब तक कारगर नहीं हो सकती, जब तक उसके पीछे मज़बूत कूटनीतिक आधार और व्यापक समर्थन मौजूद न हो। इस मामले में पाकिस्तान की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं और अब उसे आर्थिक तथा कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर दबाव झेलना पड़ रहा है।

सियासी विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भविष्य में इस प्रकार की कानूनी और कूटनीतिक पहल शुरू करने से पहले पाकिस्तान को उसके संभावित आर्थिक और राजनीतिक परिणामों का गंभीरता से आकलन करना होगा। मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि जल्दबाज़ी में उठाया गया यह क़दम उसके लिए लाभ से अधिक नुकसानदेह साबित हुआ है।

कुल मिलाकर, सिंधु जल संधि को लेकर शुरू की गई यह कूटनीतिक मुहिम पाकिस्तान की उम्मीदों के अनुरूप परिणाम नहीं दे सकी। जिस प्रक्रिया के माध्यम से वह भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरने का प्रयास कर रहा था, वही अब उस पर बढ़ते आर्थिक बोझ, सीमित कूटनीतिक समर्थन और रणनीतिक असफलता की चर्चा का कारण बन गई है। विश्लेषकों के अनुसार यह घटनाक्रम इस बात का संकेत देता है कि केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा लेने के बजाय प्रभावी कूटनीति, विश्वसनीय नीति और दीर्घकालिक रणनीति किसी भी देश के लिए अधिक महत्वपूर्ण होती है।

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