मिली जानकारी के मुताबिक़, चार से सोलह साल तक की उम्र के हज़ारों बच्चे अपने स्कूल यूनिफ़ॉर्म में रावलाकोट की गलियों और मुख्य सड़कों पर दिखाई दिए। प्रदर्शन के दौरान बच्चों ने ऐसे नारे लगाए जो पाकिस्तान की नीतियों और सुरक्षा तंत्र के प्रति गहरी नाराज़गी का इज़हार करते नज़र आए। सबसे ज़्यादा चर्चा जिस नारे की रही, वह था— "ये जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है।" यह नारा पूरे प्रदर्शन के दौरान लगातार गूँजता रहा और प्रदर्शनकारियों की नाराज़गी का प्रतीक बन गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह एहतिजाज केवल बच्चों तक महदूद नहीं था। बड़ी तादाद में उस्ताद, वालिदैन और स्थानीय लोग भी इसमें शरीक हुए। प्रदर्शन पूरी तरह संगठित दिखाई दिया, जहाँ लोगों ने अमन, इंसाफ़ और अपने बुनियादी हुक़ूक़ की माँग करते हुए पाकिस्तान हुकूमत की नीतियों पर सवाल उठाए। कई जगहों पर लोगों ने तख्तियाँ और बैनर भी उठाए हुए थे, जिनमें अवामी हक़ूक़, बेहतर तालीम, जवाबदेही और स्थानीय लोगों की आवाज़ सुनने की अपील दर्ज थी।
स्थानीय हलकों में इस घटनाक्रम को एक अहम मोड़ के तौर पर देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी इलाके के बच्चे और नौजवान भी खुलकर एहतिजाज का हिस्सा बनने लगें, तो यह महज़ एक राजनीतिक विरोध नहीं रह जाता, बल्कि समाज के भीतर बढ़ती बेचैनी और अविश्वास का इज़हार बन जाता है। स्कूली बच्चों का यूनिफ़ॉर्म में प्रदर्शन में शामिल होना इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि मौजूदा हालात का असर नई नस्ल पर भी साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है।
बताया जा रहा है कि स्थानीय इंतज़ामिया ने पहले ही किसी भी तरह के बड़े जमावड़े और एहतिजाज पर पाबंदी लगाने का एलान किया था। इसके बावजूद लोगों का इतनी बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरना यह दर्शाता है कि हुकूमती आदेशों का असर सीमित होता दिखाई दे रहा है। अवामी हलकों में यह भी चर्चा है कि लगातार बढ़ते सामाजिक और प्रशासनिक मसलों ने लोगों के सब्र का पैमाना भर दिया है।
माहिरों का कहना है कि बच्चों, वालिदैन और उस्तादों की एक साथ मौजूदगी इस एहतिजाज को अलग अहमियत देती है। आम तौर पर स्कूलों से जुड़े कार्यक्रमों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखा जाता है, लेकिन इस बार हालात अलग दिखाई दिए। इससे यह संदेश भी उभरकर सामने आता है कि स्थानीय आबादी का एक बड़ा तबक़ा अपने मुस्तकबिल और आने वाली नस्लों को लेकर फ़िक्रमंद है और अपनी आवाज़ बुलंद करना चाहता है।
रावलाकोट में हुए इस प्रदर्शन ने पूरे पीओजेके में चल रही अवामी नाराज़गी की बहस को फिर तेज़ कर दिया है। बीते कुछ समय से वहाँ महँगाई, बुनियादी सहूलियतों की कमी, प्रशासनिक फैसलों और स्थानीय मसलों को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं। ताज़ा घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को एक नई दिशा दे दी है, क्योंकि इस बार स्कूली बच्चों की भागीदारी ने पूरे मामले को और अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला बना दिया।
सियासी जानकारों का मानना है कि किसी भी समाज में नई नस्ल का इस तरह सार्वजनिक रूप से अपनी राय ज़ाहिर करना उस क्षेत्र के बदलते सामाजिक माहौल का संकेत माना जाता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि स्थानीय हुकूमत इस बढ़ती अवामी नाराज़गी और विरोध प्रदर्शनों पर किस तरह का रुख़ अपनाती है। फ़िलहाल रावलाकोट का यह एहतिजाज पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और इसे पीओजेके के मौजूदा हालात से जोड़कर देखा जा रहा है।


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