माहिरीन के मुताबिक़ पाकिस्तान अब विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों, कानूनी व्याख्याओं और जनमत को प्रभावित करने वाले अभियानों के सहारे यह नैरेटिव पेश करने की कोशिश कर रहा है कि कश्मीर और जल से जुड़े विवादों में बाहरी दख़ल ज़रूरी है। विश्लेषकों का कहना है कि यह रुख़ उस वक़्त सामने आया है जब पाकिस्तान को बीते वर्षों में अपने पारंपरिक सियासी और कूटनीतिक प्रयासों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इंसानी हक़ूक़ और न्याय की बातें करता है, लेकिन पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में अवाम को कई बुनियादी सुविधाओं, विकास और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े गंभीर सवालों का सामना करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर समय-समय पर महँगाई, बेरोज़गारी, बुनियादी ढाँचे और प्रशासनिक नीतियों को लेकर विरोध-प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं। ऐसे में विश्लेषकों का तर्क है कि पाकिस्तान को पहले अपने नियंत्रण वाले इलाक़ों की चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए।
सुरक्षा मामलों के जानकारों का यह भी कहना है कि आधुनिक दौर में जंग का स्वरूप बदल चुका है। अब केवल सीमा पर होने वाली गतिविधियाँ ही नहीं, बल्कि सूचना, मीडिया, साइबर स्पेस, कानूनी दलीलें और वैश्विक जनमत भी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुके हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान की मौजूदा "लॉ-फेयर" नीति को देखा जा रहा है, जहाँ कानूनी विमर्श और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत लगातार यह रुख़ दोहराता रहा है कि कश्मीर से जुड़े सभी मुद्दे द्विपक्षीय दायरे में ही सुलझाए जाने चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका की आवश्यकता नहीं है। उनका कहना है कि ऐसे मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की कोशिशें समाधान के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि पाकिस्तान वास्तविक अमन, तरक़्क़ी और क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है, तो उसे प्रचार आधारित अभियानों के बजाय अपने नियंत्रण वाले इलाक़ों में सुशासन, अवाम की भलाई, आर्थिक सुधार और भरोसे का माहौल पैदा करने पर ज़्यादा तवज्जो देनी चाहिए। उनका मानना है कि स्थायी अमन की राह संवाद, ज़िम्मेदार रवैये और जनता के हितों को प्राथमिकता देने से ही निकल सकती है, न कि विवादों को लगातार अंतरराष्ट्रीय रंग देने की कोशिशों से।


0 टिप्पणियाँ