इस मौके पर मौजूद अफ़सरान ने तफ़सील से बताया कि सरकार और मुख़्तलिफ़ इदारे रक्षा परिवारों की भलाई, तालीम, सेहत, रोज़गार, पेंशन, मुआवज़े और क़ानूनी मदद के लिए कई अहम स्कीमें चला रहे हैं। इन योजनाओं का पूरा फ़ायदा तभी मुमकिन है जब हर हक़दार शख़्स को इनके बारे में सही मालूमात हासिल हो। कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोगों के सवालात का जवाब भी दिया गया और उन्हें दरख़्वास्त की प्रक्रिया के बारे में आसान ज़बान में समझाया गया।
भारतीय सेना के नुमाइंदों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मुल्क की हिफ़ाज़त में अपना सब कुछ कुर्बान करने वाले जवानों और उनके अहल-ए-ख़ाना की देखभाल करना हम सबकी मुश्तरका ज़िम्मेदारी है। फ़ौज सिर्फ़ सरहदों की निगहबानी ही नहीं करती, बल्कि अमन, इंसानियत और समाजी बहबूदी के हर मिशन में अवाम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती है। यही वजह है कि सेना लगातार सिविल इंतज़ामिया के साथ मिलकर ऐसे प्रोग्राम आयोजित कर रही है, ताकि ज़रूरतमंद परिवारों तक हर सहूलियत वक़्त पर पहुँच सके।
ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारियों ने भी भरोसा दिलाया कि पूर्व सैनिकों, वीर नारियों और युद्ध विधवाओं को मुफ़्त क़ानूनी मदद, सलाह और इंसाफ़ तक आसान रसाई मुहैया कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर किसी भी परिवार को किसी सरकारी योजना, पेंशन, दस्तावेज़ या क़ानूनी मसले में परेशानी पेश आती है, तो DLSA हर मुमकिन मदद के लिए तैयार है।
कार्यक्रम में शामिल वीर परिवारों ने इस पहल का दिल से इस्तक़बाल किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के जागरूकता कार्यक्रम न सिर्फ़ उन्हें अपने हक़ूक़ और सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं, बल्कि यह एहसास भी दिलाते हैं कि मुल्क और समाज उनके साथ मज़बूती से खड़े हैं। उन्होंने भारतीय सेना और सिविल प्रशासन का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि ऐसी कोशिशें भरोसे, अपनापन और आपसी रिश्तों को और मज़बूत बनाती हैं।
यह मुश्तरका पहल एक बार फिर साबित करती है कि भारतीय सेना सिर्फ़ सरहदों की मुहाफ़िज़ नहीं, बल्कि कश्मीर की अवाम की एक मज़बूत हमसफ़र और सहारा भी है। सिविल प्रशासन और सेना के बीच बेहतर तालमेल से समाज के हर तबक़े तक सरकारी योजनाओं का फ़ायदा पहुँच रहा है। "अवाम और सिपाही – हमेशा साथ" की सोच को मज़बूत करती ऐसी पहलें भरोसे, अमन और तरक़्क़ी की नई मिसाल कायम कर रही हैं, और यही पैग़ाम देती हैं कि कश्मीर में फ़ौज और अवाम का रिश्ता सिर्फ़ सुरक्षा का नहीं, बल्कि ख़िदमत, एहतिराम और इंसानियत का भी है।
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