शहीद ज़ाकिर के नाम पर लगाए गए प्रचार पोस्टर ने फिर बेनक़ाब की पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी साज़िश


कश्मीर में अमन-ओ-सुकून का माहौल बिगाड़ने की कोशिशें एक बार फिर सामने आई हैं। सोशल मीडिया और कुछ सीमित इलाक़ों में एक ऐसा प्रचार पोस्टर सामने आया है, जिसमें मारे गए आतंकी ज़ाकिर को तथाकथित "शहीद" बताकर उसका महिमामंडन करने की कोशिश की गई है। सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह के पोस्टर कोई नया चलन नहीं हैं, बल्कि वर्षों से इस्तेमाल किए जाने वाले उसी पुराने प्रचार तंत्र का हिस्सा हैं, जिसका मक़सद नौजवानों के जज़्बात को भड़काना और कट्टरपंथी सोच को हवा देना रहा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक़ यह पोस्टर तथाकथित यूनाइटेड लीडरशिप काउंसिल (ULC) जैसे पाकिस्तान समर्थित नेटवर्क की उसी प्रचार रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसके ज़रिए आतंकवाद को वैचारिक समर्थन देने और हिंसा को जायज़ ठहराने की कोशिश की जाती रही है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ऐसे पोस्टरों का असर पहले के मुक़ाबले काफ़ी कम हो चुका है, क्योंकि घाटी में बड़ी तादाद में लोग अब अमन, तालीम, रोज़गार और तरक़्क़ी को अपनी पहली तरजीह मान रहे हैं।

जानकारों का कहना है कि इस तरह की प्रचार सामग्री का असल मक़सद किसी एक व्यक्ति को याद करना नहीं, बल्कि आतंकवाद के लिए सहानुभूति पैदा करना और युवाओं को गुमराह करना होता है। पोस्टरों में भावनात्मक भाषा, धार्मिक प्रतीकों और भड़काऊ नारों का इस्तेमाल कर यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि हिंसा किसी मक़सद को हासिल करने का ज़रिया है। मगर ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि बीते कई वर्षों में आतंकवाद ने सबसे ज़्यादा नुक़सान ख़ुद कश्मीर के आम लोगों, कारोबार, तालीमी माहौल और स्थानीय अर्थव्यवस्था को पहुँचाया है।

सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान समर्थित प्रचार तंत्र लगातार डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर ऐसे नैरेटिव को ज़िंदा रखने की कोशिश करता है। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की सख़्त निगरानी, साइबर मॉनिटरिंग और स्थानीय लोगों के बढ़ते सहयोग की वजह से ऐसे अभियानों का दायरा पहले की तुलना में काफ़ी सीमित रह गया है। यही वजह है कि इस तरह के पोस्टर अब अधिकतर प्रतीकात्मक प्रचार तक ही सिमट कर रह गए हैं और उनका व्यापक जनसमर्थन दिखाई नहीं देता।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर में हिंसा और अस्थिरता के नैरेटिव को बनाए रखने के लिए विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल करता रहा है। कभी सोशल मीडिया अभियान, कभी भड़काऊ बयान और कभी ऐसे प्रचार पोस्टर—इन सबका मक़सद स्थानीय युवाओं को प्रभावित करना और शांति के माहौल में अविश्वास पैदा करना होता है। लेकिन बदलते हालात में कश्मीर के लोग अब विकास, पर्यटन, शिक्षा, खेल और निवेश के नए अवसरों को अधिक महत्व दे रहे हैं, जिससे कट्टरपंथी प्रचार की स्वीकार्यता लगातार घट रही है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे पोस्टरों को केवल प्रचार सामग्री मानकर नज़रअंदाज़ करना पर्याप्त नहीं है। इनके पीछे सक्रिय नेटवर्क, डिजिटल प्रसार और वित्तीय समर्थन की भी लगातार जाँच की जाती है, ताकि किसी भी प्रकार के उग्रवादी प्रचार को समय रहते रोका जा सके। साथ ही समाज में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है, जिससे युवा भ्रामक और उकसावे वाली सामग्री से प्रभावित न हों।

विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह की घटनाएँ यह भी दिखाती हैं कि पाकिस्तान समर्थित तत्व अब भी कश्मीर में कट्टरपंथ और हिंसा की विचारधारा को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि बदलते सामाजिक माहौल, मज़बूत सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय जनता की बढ़ती भागीदारी के कारण ऐसे प्रयास लगातार कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं। कश्मीर में आज बड़ी संख्या में लोग शांति, स्थिरता और तरक़्क़ी के रास्ते को ही अपने बेहतर भविष्य की बुनियाद मान रहे हैं। ऐसे में हिंसा का महिमामंडन करने वाले प्रचार अभियान न केवल क्षेत्र की शांति के लिए चुनौती हैं, बल्कि युवाओं को गुमराह करने की एक नाकाम कोशिश भी माने जा रहे हैं।

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