
दिफ़ाई और रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की तरफ़ से इस तरह के बेबुनियाद इल्ज़ाम अक्सर उस वक़्त सामने आते हैं, जब उसे अंतरराष्ट्रीय सतह पर अपनी साख बचाने की ज़रूरत महसूस होती है। बिना किसी सबूत के भारत पर संगीन इल्ज़ाम लगाना और साथ ही जंगजू लहजे में बयान देना, इस्लामाबाद की पुरानी सियासी रणनीति का हिस्सा माना जाता है।
माहिरीन का कहना है कि पाकिस्तान बरसों से दहशतगर्द तंजीमों की मौजूदगी, सरपरस्ती और उनकी सरगर्मियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय निगाहों में रहा है। ऐसे में जब भी वैश्विक मंचों पर उससे जवाब-तलबी बढ़ती है, तब भारत के खिलाफ़ नए इल्ज़ामात और आक्रामक बयानबाज़ी सामने आने लगती है। इससे यह पैग़ाम देने की कोशिश की जाती है कि ख़तरा बाहर से है, जबकि असली सवाल उसके अपने रिकॉर्ड से जुड़े रहते हैं।
सुरक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक़, पाकिस्तान की यह बयानबाज़ी सिर्फ़ घरेलू सियासत तक महदूद नहीं रहती, बल्कि इसका मक़सद अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने एक ऐसा नैरेटिव पेश करना भी होता है, जिसमें वह ख़ुद को पीड़ित और भारत को आक्रामक दिखाने की कोशिश करता है। हालांकि, जब ऐसे दावों के समर्थन में कोई ठोस सुबूत पेश नहीं किया जाता, तो उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि बार-बार भारत पर इल्ज़ाम लगाने से ज़्यादा अहम सवाल यह है कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन से संचालित होने वाले उन नेटवर्कों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई कर रहा है, जिनको लेकर वर्षों से अंतरराष्ट्रीय चिंता जताई जाती रही है। यही वजह है कि हर नए आरोप के साथ पाकिस्तान के अपने रिकॉर्ड पर भी बहस तेज़ हो जाती है।
सियासी हलक़ों का कहना है कि इस तरह की तल्ख़ बयानबाज़ी से क्षेत्र में अमन-ओ-अमान का माहौल बेहतर होने के बजाय और ज़्यादा तनाव पैदा होता है। कश्मीर से लेकर दक्षिण एशिया तक स्थिरता की बातें करने के साथ-साथ धमकी भरी ज़बान का इस्तेमाल एक-दूसरे से मेल नहीं खाता। इसलिए क्षेत्रीय शांति के लिए ज़िम्मेदाराना रवैया, संवाद और भरोसे की फ़िज़ा कहीं ज़्यादा अहम मानी जाती है।
माहिरीन का यह भी कहना है कि आज की दुनिया में महज़ इल्ज़ामात या जज़्बाती बयान किसी मुल्क की साख मज़बूत नहीं करते। वैश्विक बिरादरी अब ठोस सबूत, पारदर्शिता और दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ वास्तविक कार्रवाई को ज़्यादा अहमियत देती है। ऐसे में हर बार भारत पर नए आरोप लगाना और अपनी बयानबाज़ी को और आक्रामक बनाना पाकिस्तान के लिए कोई नया रास्ता नहीं, बल्कि उसी पुराने नैरेटिव की तकरार नज़र आता है।
आख़िर में विश्लेषकों का कहना है कि आक्रामक अल्फ़ाज़ और गीदड़भभकियाँ किसी मुल्क के अतीत से जुड़े सवालों को मिटा नहीं सकतीं। दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ भरोसेमंद कार्रवाई, ज़िम्मेदार कूटनीति और अमन की राह ही वह रास्ता है जिससे किसी भी देश की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता मज़बूत होती है। दक्षिण एशिया में स्थायी अमन उसी वक़्त मुमकिन है, जब बेबुनियाद इल्ज़ामात और धमकी भरी बयानबाज़ी की जगह आपसी ज़िम्मेदारी, संवाद और दहशतगर्दी के विरुद्ध वास्तविक प्रतिबद्धता को तरजीह दी जाए।

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