जानकारों का कहना है कि इस तरह का डिजिटल प्रचार कोई नया तरीका नहीं है, बल्कि यह लंबे अरसे से कट्टरपंथी संगठनों की रणनीति का हिस्सा रहा है। पहले जहाँ भर्ती और प्रचार के लिए गुप्त नेटवर्क या सीमित माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता था, वहीं अब सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और वीडियो प्लेटफ़ॉर्म्स के ज़रिए तेज़ी से भ्रामक नैरेटिव फैलाने की कोशिश की जा रही है।
सुरक्षा मामलों के जानकारों के मुताबिक ऐसे वीडियो का मक़सद केवल प्रचार करना नहीं होता, बल्कि युवाओं की भावनाओं को भड़काकर उन्हें हिंसा की राह पर धकेलना भी होता है। वीडियो में वास्तविक हालात को नज़रअंदाज़ करते हुए हथियार उठाने वालों को हीरो की तरह दिखाया जाता है, जबकि दहशतगर्दी से आम लोगों को होने वाले नुक़सान, मासूम नागरिकों की जान-माल की हानि और कश्मीर के विकास पर पड़ने वाले असर को पूरी तरह छिपा लिया जाता है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की सामग्री के पीछे एक सुनियोजित डिजिटल प्रचार तंत्र काम करता है, जिसका उद्देश्य कश्मीर की ज़मीनी हक़ीक़त को तोड़-मरोड़कर पेश करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ग़लत धारणा बनाना होता है। ऐसी सामग्री में भावनात्मक संगीत, प्रतीकात्मक दृश्य और चयनित संदेशों का इस्तेमाल कर यह आभास देने की कोशिश की जाती है कि हिंसा ही समस्याओं का समाधान है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क और उनके प्रचार तंत्र लंबे समय से डिजिटल माध्यमों के ज़रिए दुष्प्रचार फैलाने की कोशिश करते रहे हैं। उनका उद्देश्य स्थानीय युवाओं को गुमराह करना, समाज में अविश्वास पैदा करना और शांति के माहौल को प्रभावित करना माना जाता है। इस तरह का प्रचार उन सकारात्मक बदलावों से ध्यान हटाने का प्रयास भी होता है जो हाल के वर्षों में शिक्षा, पर्यटन, खेल, रोज़गार और आधारभूत ढाँचे के विकास के क्षेत्र में देखने को मिले हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कश्मीर का नौजवान आज शिक्षा, तकनीक, स्टार्टअप, खेल, पर्यटन और स्वरोज़गार जैसे क्षेत्रों में नई पहचान बना रहा है। ऐसे में कट्टरपंथी प्रचार का उद्देश्य युवाओं की इसी सकारात्मक सोच को कमज़ोर करना और उन्हें हिंसा के रास्ते की ओर मोड़ना है। उनका मानना है कि जागरूकता, डिजिटल साक्षरता और परिवार तथा समाज की सक्रिय भूमिका ही इस तरह के दुष्प्रचार का सबसे प्रभावी जवाब है।
सुरक्षा एजेंसियाँ भी लगातार यह अपील करती रही हैं कि सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली किसी भी संदिग्ध या भड़काऊ सामग्री को बिना सत्यापन के साझा न किया जाए। ऐसी सामग्री का प्रसार अनजाने में भी कट्टरपंथी संगठनों के प्रचार अभियान को बढ़ावा दे सकता है। नागरिकों से आग्रह किया गया है कि वे किसी भी संदिग्ध डिजिटल गतिविधि की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दें और अफ़वाहों से दूर रहें।
विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर का भविष्य अमन, तालीम, तरक़्क़ी और रोज़गार में है, न कि हिंसा और दहशतगर्दी में। आज घाटी में पर्यटन, खेल प्रतियोगिताओं, शिक्षा, बुनियादी ढाँचे और युवाओं के लिए नए अवसरों का विस्तार हो रहा है। ऐसे में डिजिटल प्रचार के ज़रिए फैलाए जा रहे भ्रामक नैरेटिव का उद्देश्य इन्हीं सकारात्मक बदलावों को कमज़ोर करना और अशांति का माहौल पैदा करना है।
अहल-ए-राय का कहना है कि दहशतगर्दी का डिजिटल प्रचार चाहे जितना आधुनिक क्यों न हो, उसकी बुनियाद हिंसा, डर और गुमराही पर टिकी होती है। इसके मुक़ाबले में अमन, विकास, शिक्षा और नौजवानों को सकारात्मक अवसरों से जोड़ना ही कश्मीर के स्थायी और बेहतर मुस्तक़बिल की असली राह है।


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