सी जिहाद' नैरेटिव के ज़रिए आतंकी संगठनों की बढ़ती सांठगांठ सामने आई


पाकिस्तान की सरज़मीं से चल रहे दहशतगर्द नेटवर्क और उनके आपसी ताल्लुक़ात को लेकर एक और अहम पहलू सामने आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक़, जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े एक सोशल मीडिया अकाउंट ने हमास की अंडरवॉटर ट्रेनिंग से जुड़ी एक वीडियो शेयर की है। इस घटनाक्रम को उन कोशिशों के तौर पर देखा जा रहा है, जिनके ज़रिए अलग-अलग दहशतगर्द तंजीमें एक-दूसरे की रणनीतियों और तरीक़ों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं।

जानकारों का कहना है कि इस तरह की वीडियो सिर्फ़ प्रोपेगेंडा का ज़रिया नहीं होतीं, बल्कि इनके ज़रिए नए तौर-तरीकों को प्रचारित करने और दहशतगर्द गिरोहों के बीच असर-ओ-रसूख़ बढ़ाने की कोशिश भी की जाती है। इसी सिलसिले में लश्कर-ए-तैयबा की तरफ़ से पहले सामने आए "सी जिहाद" के नैरेटिव का भी ज़िक्र किया जा रहा है, जिसमें समुद्री रास्तों और पानी के भीतर ऑपरेशन से जुड़ी ट्रेनिंग को बढ़ावा देने की बातें सामने आई थीं।

माहिरीन का मानना है कि ऐसे घटनाक्रम इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि पाकिस्तान से जुड़े दहशतगर्द नेटवर्क महज़ पारंपरिक आतंकी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि नई रणनीतियों और तकनीकों को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। अलग-अलग तंजीमों के बीच इस तरह की सामग्री का साझा होना उनके बीच लगातार तालमेल और सहयोग की आशंकाओं को मज़बूत करता है।

सुरक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि यह रुझान इस बात को भी उजागर करता है कि दहशतगर्द संगठन एक-दूसरे के अनुभवों, ट्रेनिंग मॉडल और प्रचार सामग्री का इस्तेमाल कर अपनी क्षमताओं को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे नेटवर्क क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती माने जाते हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक़, पाकिस्तान लंबे समय से अपनी ज़मीन पर सक्रिय ऐसे संगठनों के खिलाफ़ प्रभावी कार्रवाई को लेकर सवालों के घेरे में रहा है। बार-बार सामने आने वाले ऐसे घटनाक्रम इस धारणा को और मज़बूत करते हैं कि दहशतगर्द तंजीमें खुलकर अपने प्रचार, भर्ती और प्रशिक्षण से जुड़े नैरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।

सुरक्षा एजेंसियाँ ऐसे डिजिटल प्रोपेगेंडा, ऑनलाइन नेटवर्क और आतंकी संगठनों के बीच बढ़ते संपर्कों पर कड़ी नज़र बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकवाद के बदलते तौर-तरीकों को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वय, सूचना साझा करने और आतंक के प्रचार तंत्र पर सख़्त निगरानी पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गई है।

इसी के साथ यह भी कहा जा रहा है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई केवल ज़मीनी कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर फैलाए जा रहे कट्टरपंथी प्रचार का मुक़ाबला करना भी उतना ही अहम है। दहशतगर्द संगठनों की आपसी नज़दीकियाँ और साझा प्रचार सामग्री इस बात की याद दिलाती हैं कि आतंकवाद का पूरा इकोसिस्टम आपस में जुड़ा हुआ है और उससे निपटने के लिए व्यापक तथा सतर्क रणनीति की ज़रूरत है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ