पाकिस्तान की दहशतगर्द फैक्ट्री का नया चेहरा — अब औरतों और बच्चों को बनाया जा रहा है हथियार


पाकिस्तान की सरज़मीं पर एक बार फिर ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने दुनिया भर में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने अब अपने नेटवर्क को और फैलाने के लिए औरतों की भर्ती शुरू कर दी है। मुरिदके स्थित उसके मुख्यालय मरकज़ तैयबा के अलावा इस्लामाबाद के मरकज़ क़ुबा, रहीम यार खान और मुल्तान में भी महिलाओं को संगठन से जोड़ने की कोशिशें तेज़ कर दी गई हैं।

सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है कि महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे मजहबी तालीम के नाम पर विशेष सत्रों में हिस्सा ले रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वाकई तालीम है, या फिर एक ऐसी सोच तैयार की जा रही है जो नफरत और इंतहापसंदी को बढ़ावा देती है?

दुनिया अच्छी तरह जानती है कि लश्कर-ए-तैयबा कोई आम तंजीम नहीं, बल्कि वह नाम है जिस पर कई बड़े आतंकी हमलों के इल्ज़ाम लग चुके हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान की हुकूमत हर बार यही दावा करती है कि उसका इन संगठनों से कोई ताल्लुक नहीं है। मगर हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।

आज अगर औरतों को इस रास्ते पर लाया जा रहा है और मासूम बच्चों के जहन में छोटी उम्र से ही एक खास सोच डाली जा रही है, तो यह सिर्फ एक संगठन की हरकत नहीं लगती, बल्कि एक सुनियोजित सिलसिला दिखाई देता है। यह वही तरीका है जिसमें मजहब का इस्तेमाल करके लोगों की भावनाओं को भड़काया जाता है, उन्हें जज़्बाती बनाया जाता है और फिर एक ऐसे रास्ते पर डाल दिया जाता है जहां से वापसी बेहद मुश्किल हो जाती है।

कश्मीर की ज़ुबान में एक बात कही जाती है—
"मज़हब छु मोहब्बत हंद रास्ता, न कि नफ़रत हंद हथियार।"
यानी मजहब मोहब्बत का रास्ता है, नफरत का हथियार नहीं।

लेकिन अफसोस, पाकिस्तान में कुछ ताकतें मजहब को इंसानियत से जोड़ने के बजाय उसे अपने सियासी और दहशतगर्द मकसदों के लिए इस्तेमाल करती रही हैं। कभी मदरसों के जरिए, कभी चंदे के नाम पर और अब औरतों और बच्चों को सामने लाकर एक नई नस्ल तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

यह सिर्फ पाकिस्तान का अंदरूनी मामला नहीं है। जब किसी मुल्क की जमीन पर ऐसी तंजीमें खुलकर काम करें, भर्ती अभियान चलाएं और उनके वीडियो खुलेआम सामने आएं, तो दुनिया के सामने उस मुल्क की नीयत पर सवाल उठना लाजिमी है। एक तरफ इस्लामाबाद दुनिया के मंचों पर खुद को आतंकवाद का शिकार बताता है, दूसरी तरफ उसकी सरज़मीं पर ऐसे नेटवर्क लगातार फैलते दिखाई देते हैं।

अवाम पूछ रही है कि आखिर कब तक मजहब के नाम पर नौजवानों, औरतों और बच्चों के मुस्तकबिल से खेला जाएगा? कब तक नफरत की खेती को "जिहाद" का नाम देकर नई पीढ़ियों को गुमराह किया जाएगा?

हकीकत यही है कि पाकिस्तान की यह तथाकथित "दहशतगर्द फैक्ट्री" अब एक नए दौर में दाखिल हो चुकी है, जहां बंदूक उठाने वालों की कतार में औरतों को शामिल किया जा रहा है और मासूम बच्चों के जहन को अपने मकसद के मुताबिक ढालने की कोशिश हो रही है।

यह सिर्फ एक भर्ती अभियान नहीं, बल्कि उस सोच की तस्वीर है जो अमन से ज्यादा नफरत को अहमियत देती है। और जब तक इस सोच पर लगाम नहीं लगती, तब तक दुनिया के सामने पाकिस्तान के दोहरे चेहरे पर सवाल उठते रहेंगे।

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