रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की हुकूमत ने यह संदेश देने की कोशिश की कि इस्लामाबाद में हुई बातचीत और समझौते की प्रक्रिया में उसका अहम रोल रहा है। दावा यह भी किया गया कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच दूरी कम करने, पाबंदियों में राहत दिलाने और खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मगर ईरानी मीडिया की कई रिपोर्टों में इन दावों को गलत और हकीकत से दूर बताया गया है।
ईरानी मीडिया का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच जो भी बातचीत हुई या जिस भी स्तर पर संपर्क स्थापित हुआ, उसमें पाकिस्तान की किसी औपचारिक मध्यस्थता का कोई रिकॉर्ड नहीं है। इन रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान की तरफ से अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी अहमियत साबित की जा सके।
उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल के दिनों में कई मौकों पर अपनी सरकार की विदेश नीति की कामयाबियों का जिक्र किया है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान क्षेत्र में अमन और स्थिरता के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसके प्रयासों को सराह रहा है। लेकिन ईरानी मीडिया के इन बयानों के बाद विपक्ष और आलोचकों को सरकार पर निशाना साधने का नया मौका मिल गया है।
सियासी जानकारों का कहना है कि अगर किसी मुल्क के दावों को दूसरा पक्ष सार्वजनिक तौर पर खारिज कर दे, तो इससे उसकी साख पर असर पड़ता है। यही वजह है कि अब पाकिस्तान की विदेश नीति और उसके कूटनीतिक दावों पर फिर से बहस शुरू हो गई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में किसी भी उपलब्धि को पेश करने से पहले तथ्यों और आधिकारिक पुष्टि का होना बेहद जरूरी होता है, वरना ऐसे दावे उल्टा नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।
जनाब, यह पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान को अपने कूटनीतिक बयानों को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा हो। इससे पहले भी कई मौकों पर उसकी विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय दावों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब ईरानी मीडिया की तरफ से आई इस प्रतिक्रिया ने एक बार फिर पाकिस्तान को मुश्किल स्थिति में ला खड़ा किया है।
फिलहाल इस पूरे मामले पर पाकिस्तान सरकार की तरफ से विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है। मगर इतना जरूर है कि ईरानी मीडिया की इस साफ़ अस्वीकृति ने पाकिस्तान के दावों को लेकर नई बहस छेड़ दी है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी कूटनीतिक रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले पर इस्लामाबाद किस तरह अपनी सफाई पेश करता है और क्या वह इस कथित कूटनीतिक झटके से उबर पाता है या नहीं।


0 टिप्पणियाँ