अनुपमा सिंह ने अपने ख़िताब में साफ़ अल्फ़ाज़ में कहा कि जम्मू-कश्मीर हिंदुस्तान का अटूट और अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर कोई विवाद नहीं है। अगर कोई मसला बाकी है तो वह सिर्फ़ पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्ज़े वाला हिस्सा यानी पीओजेके है, जहां के लोगों को आज भी बुनियादी हक़ और इंसाफ़ नसीब नहीं हो रहा।
उन्होंने दुनिया का ध्यान हाल ही में रावलाकोट में हुई उस दर्दनाक घटना की तरफ़ भी दिलाया जिसने पाकिस्तान के लोकतंत्र और इंसानी हुकूक के तमाम दावों की पोल खोल दी। सात और आठ जून 2026 को रावलाकोट में लोग अपने हक़ और बेहतर ज़िंदगी की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। मगर उनके हाथों में हथियार नहीं थे, उनके पास सिर्फ़ अपनी आवाज़ थी। लेकिन पाकिस्तान की फ़ौज ने इन आवाज़ों को सुनने के बजाय गोलियों से दबाने की कोशिश की।
रिपोर्टों के मुताबिक़ इस कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारियों की मौत हुई जबकि बड़ी तादाद में लोग ज़ख्मी हुए। इलाके में दहशत का माहौल पैदा हो गया और लोगों ने पाकिस्तान की फ़ौज पर बर्बरता का इल्ज़ाम लगाया। सवाल ये उठता है कि जो मुल्क हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीरियों के हक़ की बात करता है, आखिर वही अपने कब्ज़े वाले कश्मीर में लोगों की आवाज़ क्यों कुचल रहा है।
अनुपमा सिंह ने अपने बयान में इसी दोहरे रवैये को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक तरफ़ खुद को कश्मीरियों का हमदर्द बताता है और दूसरी तरफ़ पीओजेके में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर गोलियां चलाता है। यह सिर्फ़ पाखंड नहीं बल्कि इंसानी हुकूक की खुली तौहीन है।
जनाब, रावलाकोट की सड़कों पर बहा खून एक ऐसा सवाल बन चुका है जिसका जवाब पाकिस्तान के हुक्मरानों के पास नहीं है। वहां के लोग महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट और राजनीतिक अधिकारों की कमी के खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं, लेकिन हर बार उन्हें ताकत के दम पर चुप कराने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि पीओजेके में पाकिस्तान के खिलाफ़ नाराज़गी लगातार बढ़ रही है।
आज दुनिया ये देख रही है कि जो मुल्क खुद अपने नागरिकों के साथ इंसाफ़ नहीं कर सकता, वह दूसरों को इंसाफ़ का पाठ नहीं पढ़ा सकता। पाकिस्तान की फ़ौज पर बार-बार ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि वह असहमति की हर आवाज़ को दबाने के लिए कठोर बल प्रयोग करती है। रावलाकोट की घटना ने इन आरोपों को और गहरा कर दिया है।
यूएनएचआरसी में हिंदुस्तान का यह बयान सिर्फ़ एक कूटनीतिक जवाब नहीं था बल्कि उन लोगों की आवाज़ भी था जो पीओजेके में अपने हक़ के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह संदेश साफ़ था कि दुनिया को अब पाकिस्तान के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच का फर्क समझना होगा।
जनाब, जो मुल्क इंसाफ़ की बातें करे मगर अपने ही लोगों पर गोलियां बरसाए, उसकी साख दुनिया में कितनी बचती है, इसका फैसला अब दुनिया खुद कर रही है। रावलाकोट की घटना ने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि सच को ज्यादा देर तक छिपाया नहीं जा सकता और इंसाफ़ की मांग करने वाली आवाज़ें आखिरकार दुनिया तक पहुंच ही जाती हैं।


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