
अपने जोशीले ख़िताब में अर्शद ने इल्ज़ाम लगाया कि पाकिस्तान ने पीओजेके के लोगों को सिर्फ़ वादों और नारों के सहारे रखा, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि इलाक़ा बेरोज़गारी, बिजली संकट, पानी की कमी और आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है। उन्होंने कहा कि यहां के नौजवानों के लिए रोज़गार के मौक़े बेहद सीमित हैं, जबकि प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाला फ़ायदा स्थानीय आबादी तक नहीं पहुंचता।
अर्शद ने कहा कि पीओजेके में आवाज़ उठाने वालों को दबाने के लिए जबरन गुमशुदगियों, डराने-धमकाने और राजनीतिक दमन का सहारा लिया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कई सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को केवल इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने अवाम के हक़ में बात की। उनके मुताबिक़, जो भी शख़्स इंसाफ़, बराबरी और सम्मान की बात करता है, उसे दबाने की कोशिश की जाती है।
उन्होंने पाकिस्तान की फ़ौज पर इल्ज़ाम लगाते हुए कहा कि पीओजेके के संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों को उसका कोई लाभ नहीं मिल रहा। जलविद्युत परियोजनाओं और दूसरे संसाधनों से हासिल होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा बाहर चला जाता है, जबकि स्थानीय आबादी लगातार बिजली कटौती और पानी की किल्लत का सामना कर रही है।
अपने संबोधन में उन्होंने 27 जुलाई 2026 को होने वाले आज़ाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों का भी ज़िक्र किया और लोगों से ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में मतदान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि अगर कश्मीरी अपने हक़, पहचान और सम्मान की लड़ाई को मज़बूत करना चाहते हैं तो उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज़ बुलंद करनी होगी। अर्शद ने लोगों से अपील की कि वे ऐसी क़ियादत को चुनें जो अवाम के मसाइल को प्राथमिकता दे और पाकिस्तान की नाकाम नीतियों के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़ी हो सके।
जलसे में मौजूद लोगों ने भी महंगाई, बेरोज़गारी, लगातार बिजली कटौती और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर की। कई स्थानीय वक्ताओं ने कहा कि पीओजेके की जनता अब अपने हालात को लेकर पहले से कहीं ज़्यादा जागरूक है और अपने बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही है।
सियासी जानकारों का मानना है कि हाल के वर्षों में पीओजेके में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ असंतोष बढ़ा है। आर्थिक संकट, सीमित रोज़गार के अवसर, संसाधनों के दोहन और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर उठ रहे सवालों ने स्थानीय आबादी में बेचैनी पैदा की है। यही वजह है कि अब कई सामाजिक और राजनीतिक समूह खुलकर अधिकारों, जवाबदेही और बेहतर शासन की मांग कर रहे हैं।
ख्वाजा मेहरान अर्शद का यह बयान एक बार फिर इस बहस को तेज़ करता है कि पीओजेके के लोग अपने भविष्य, संसाधनों और राजनीतिक अधिकारों पर अधिक नियंत्रण चाहते हैं। जलसे से उभरा संदेश साफ़ था कि अवाम अपने हक़ूक़, इज़्ज़त और इंसाफ़ के लिए आवाज़ बुलंद कर रही है और पाकिस्तान की नीतियों को लेकर गंभीर सवाल उठा रही है।

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