पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान (PoGB) में हालात उस वक़्त नाज़ुक मोड़ पर पहुंच गए जब रियासत ने अमनपसंद एहतिजाज का जवाब गोलियों से दिया। कुछ प्रदर्शन तो आलमी सियासत, खासकर अमेरिका-ईरान तनाज़े (तनाव) के असर में भी हुए थे, लेकिन वहां की मुकामी शिया आबादी खुद को सीधे निशाने पर महसूस करने लगी। शिया बच्चों की मौत कोई “ग़लती” नहीं, बल्कि एक पैगाम बन गई।
PoGB के लोगों के लिए ये बच्चे कुर्बानी की सबसे बड़ी मिसाल बन चुके हैं। जब कोई रियासत अपने ही नौजवानों से डरने लगे और जवाब में गोलियां चलाए, तो वो अपनी अखलाकी नाकामी खुद कबूल कर लेती है। इन मौतों ने फिरकावाराना फर्क मिटाकर इलाके को एक नए मुक़ावमत (प्रतिरोध) के झंडे तले जमा कर दिया है।
लेकिन ये कत्ल सिर्फ सतह पर दिखने वाला हिस्सा है। इसके पीछे जबरी गुमशुदगियों (Enforced Disappearances) का एक लंबा और स्याह सिलसिला मौजूद है। बरसों से पाकिस्तान आर्मी “लापता अफ़राद” को एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही है ताकि लोगों की हिम्मत तोड़ी जा सके। जो एक्टिविस्ट, स्टूडेंट या कम्युनिटी लीडर अपने हुकूक़, कुदरती संसाधनों की लूट या आइनी हक़ की बात करता है, वो अचानक “गायब” कर दिया जाता है।
PoGB और POK में “वीगो” गाड़ियों का खौफ — जिन्हें अगवा करने वाली गाड़ियों के तौर पर जाना जाता है — अब गुस्से में बदलता जा रहा है। लापता लोगों के खानदान अब खामोशी से मातम नहीं कर रहे, बल्कि सड़कों पर निकल कर इंसाफ़ मांग रहे हैं। इस रवैये ने उस रियासत की पोल खोल दी है जो खुद को “मुहाफ़िज़” कहती है लेकिन अपने ही लोगों को बुनियादी इंसानी हक़, यहां तक कि अदालत में पेश होने का हक़ भी नहीं देती।
दुनिया पाकिस्तान को लंबे अरसे से दहशतगर्दी की पनाहगाह मानती रही है, जहां गैर-रियासती गिरोहों को “स्ट्रैटेजिक एसेट” की तरह पाला जाता है। लेकिन PoGB और POK के लोग खुद इस पॉलिसी के सबसे बड़े घरेलू शिकार हैं। एक तरफ रियासत इंतहापसंद गिरोहों को जगह देती है, दूसरी तरफ अमनपसंद एहतिजाज करने वालों को “एंटी-स्टेट” या “दहशतगर्द” करार देती है।
तंज़ (विडंबना) ये है कि वही फौजी निज़ाम, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामज़द दहशतगर्दों को पनाह देता है, “एंटी-टेरर” कानूनों का इस्तेमाल कर स्थानीय शिया आलिमों और सियासी कारकुनों के बैंक खाते फ्रीज़ करता है और उनकी आवाजाही पर पाबंदियां लगाता है। अब लोग साफ़ देख रहे हैं कि जिस “दहशतगर्दी” का हवाला देकर फौज इलाके को मिलिट्री ज़ोन बनाती है, असल खतरा खुद उसकी कट्टरपंथी पॉलिसियां हैं।
बरसों तक हुकूमत ने “फूट डालो और राज करो” की सियासत अपनाई। शिया-सुन्नी तफरक़े को हवा देकर गिलगित-बाल्टिस्तान में लोगों को आपस में उलझाए रखा गया ताकि वो अपने संसाधनों की लूट पर सवाल न उठा सकें।
मगर हालिया खूनखराबे ने इस सियासत को उल्टा कर दिया। शिया नौजवानों को निशाना बनाने के बाद पहली बार बड़े पैमाने पर फिरकों के बीच यकजहती (एकजुटता) देखने को मिली। लोग समझ रहे हैं कि चाहे वो शिया हों या सुन्नी, दोनों बराबर तौर पर महरूम और दबाए गए हैं। अब लड़ाई एक-दूसरे से नहीं, बल्कि उस निज़ाम से है जो जमीन को अहम समझता है लेकिन इंसानों को बोझ।
गिलगित में उठी ये आग अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) तक फैल चुकी है। वहां महंगाई, टैक्सों का बोझ और नीलम दरिया के संसाधनों की खुली लूट ने गुस्से को चरम पर पहुंचा दिया है, जबकि स्थानीय लोग अंधेरे में जीने को मजबूर हैं।
जब मुज़फ्फराबाद के लोग गिलगित के बच्चों की लाशें देखते हैं, तो उन्हें अपना आने वाला कल नज़र आता है। “कश्मीर बनेगा खुदमुख्तार” का नारा अब तेजी से फैल रहा है — किसी बाहरी ताकत की वजह से नहीं, बल्कि अंदरूनी बेवफाई के कारण। POK के लोग, जिन्हें कभी “बेस कैंप” कहा जाता था, अब खुलेआम फौजी कयादत के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। “मुहाफ़िज़” का चेहरा अब “शिकारी” के तौर पर देखा जा रहा है, जो गरीबों के संसाधन लूट कर अमीर तबके की ऐशो-आराम की जिंदगी चलाता है।
इस इलाके की खास आबादी और मजहबी बनावट इसे मिडिल ईस्ट की सियासत से भी जोड़ती है। अमेरिका-ईरान तनाज़े को बहाना बना कर शिया आबादी पर “कौमी सलामती” के नाम पर शिकंजा कसा जाता है। स्थानीय शिया समुदाय को “ईरान का एजेंट” बताकर उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश होती है। दरअसल ये सब एक असली, घरेलू हक़ और इज़्ज़त की तहरीक को बदनाम करने की कोशिश है।
आज पाकिस्तान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसके सरहदी इलाके अब खामोश तमाशबीन बनने को तैयार नहीं। PoGB में बच्चों की मौत ने “मुक़ावमत की नई नस्ल” पैदा कर दी है, जिसे न जेल का डर है और न फांसी का।
पाकिस्तान आर्मी की जबरी गुमशुदगियां, फिरकावाराना सियासत और बंदूक़ के जोर पर चलने वाली रणनीति अब नाकाम होती दिख रही है। बच्चों की कब्रों पर कोई मुल्क खड़ा नहीं किया जा सकता। PoGB और POK में उबलता गुस्सा साफ़ बता रहा है कि खामोश गुलामी का दौर खत्म हो चुका है। अगर रियासत दहशतगर्दी की पनाहगाह बनी रही और अपने ही लोगों के लिए कब्रिस्तान बनती रही, तो जिस जमीन पर वो कब्ज़ा बनाए रखना चाहती है, वही जमीन इंकलाब का ज्वालामुखी बन जाएगी।
गिलगित की सर्द सड़कों पर बहा खून अब एक नई दास्तान लिख चुका है — ऐसी दास्तान, जिसमें लोग आखिरकार अपनी आवाज़, अपनी जमीन और अपना मुस्तकबिल एक जाबिर फौजी निज़ाम के चंगुल से वापस लेने की कोशिश कर रहे हैं।

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