
जानकारों का कहना है कि यह कोई इक्का-दुक्का वाक़िया नहीं, बल्कि एक बड़ी और मुनज़्ज़म रणनीति का हिस्सा है। छोटी उम्र में बच्चों की सोच को इस तरह ढाला जा रहा है कि उनके लिए हिंसा एक आम और जायज़ रास्ता बन जाए। मासूमियत की उस उम्र में, जहाँ बच्चों को खेल, पढ़ाई और बेहतर मुस्तक़बिल के ख्वाब देखने चाहिए, वहाँ उन्हें नफ़रत और इंतक़ाम का सबक पढ़ाया जा रहा है।
इस पूरे मामले में पाकिस्तान के सिक्योरिटी ढांचे और ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह की गतिविधियाँ एक लंबे अरसे से चल रही उस रणनीति का हिस्सा हैं, जिसके तहत नई पीढ़ी को कट्टरपंथ की तरफ मोड़कर सरहद पार दहशतगर्दी के लिए तैयार किया जाता है। यह सिलसिला न सिर्फ इलाके की अमन-ओ-अमान के लिए खतरा है, बल्कि उन बच्चों के मुस्तक़बिल को भी अंधेरे में धकेल रहा है, जिन्हें सही तालीम और परवरिश की सख्त ज़रूरत है।
मामले का सबसे अफसोसनाक पहलू यह है कि मासूम बच्चों को एक ऐसे रास्ते पर डाला जा रहा है, जहाँ से वापसी बेहद मुश्किल हो जाती है। तालीम के नाम पर की जा रही यह ब्रेनवॉशिंग न सिर्फ उनके बचपन को छीन रही है, बल्कि पूरी एक नस्ल को हिंसा की तरफ धकेलने का जरिया बन रही है। ऐसे हालात में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने यह एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आखिर कब तक मासूमियत का यह इस्तेहसाल यूँ ही जारी रहेगा और कब इसके खिलाफ ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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