पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में ‘आज़ादी’ का सच बेनक़ाब


मुज़फ़्फ़राबाद से लेकर गिलगित-बाल्टिस्तान तक, जिस इलाक़े को पाकिस्तान “आज़ाद” कहता है, वही नाम अब सवालों के घेरे में आता जा रहा है, साहब। “पीओजेके” का ये लफ़्ज़ बहुतों के लिए सिर्फ़ एक लेबल बनकर रह गया है—एक ऐसा पर्दा, जिसके पीछे असली हालात छुपाए जाते हैं।

ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बयान करती है। यहां के दरिया, पहाड़ और खनिज दौलत का इस्तेमाल तो ज़ोर-शोर से हो रहा है, मगर स्थानीय अवाम को उसका ना मुनासिब हिस्सा मिलता है, ना ही अपने मुस्तक़बिल के बारे में खुलकर बोलने का हक़। ज़मीनों के मसले, रोज़गार की कमी और बुनियादी सहूलतों की कमी—ये सब मिलकर उस “आज़ादी” के दावे पर सवाल खड़े करते हैं।

माहिरीन का कहना है कि ये पूरा निज़ाम दरअसल स्ट्रैटेजिक कंट्रोल और रिसोर्स एक्सट्रैक्शन के इर्द-गिर्द घूमता है। इलाक़े की अहमियत सिर्फ़ जियोग्राफ़ी या सियासत तक महदूद नहीं, बल्कि यहां की नैचुरल दौलत भी एक बड़ा फैक्टर है। ऐसे में, स्थानीय लोगों की आवाज़ अक्सर दब जाती है, और उनकी बुनियादी मांगें—जैसे बेहतर रोज़गार, शिक्षा, और सियासी नुमाइंदगी—अधूरी ही रह जाती हैं।

गांव-कस्बों में रहने वाले लोग आज भी बुनियादी हक़ूक़ के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। उनकी मांग साफ़ है—इंसाफ़, बराबरी और अपने मामलों में असली हिस्सेदारी। मगर जो तस्वीर पेश की जाती है, वो इन हक़ीक़तों से काफी अलग दिखाई देती है।

ये मामला अब सिर्फ़ एक नाम या बयान का नहीं रहा, बल्कि उस फासले का है जो “दावे” और “हक़ीक़त” के बीच मौजूद है। और यही फासला आज पीओजेके के लोगों की सबसे बड़ी कहानी बन चुका है।

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