माहिरीन का कहना है कि अगर ये इल्ज़ामात सच साबित होते हैं, तो ये न सिर्फ़ पाकिस्तान की दहशतगर्दी के खिलाफ़ मुहिम पर सवाल उठाते हैं, बल्कि आलमी एंटी-टेरर फ्रेमवर्क को भी कमज़ोर करते हैं। खुले स्रोतों , थिंक-टैंक स्टडीज़ और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में पहले भी ऐसे इशारे मिलते रहे हैं, जहाँ “चयनात्मक कार्रवाई” का ज़िक्र आता है—यानी कुछ गिरोहों के खिलाफ़ सख़्ती और कुछ के प्रति नरमी।
तुलनात्मक तौर पर देखा जाए तो दुनिया के कई मुल्क—चाहे वो यूरोप हों या एशिया—दहशतगर्दी के खिलाफ़ “ज़ीरो टॉलरेंस” पॉलिसी अपनाते हैं, जहाँ किसी भी तरह के गैर-राज्य सशस्त्र समूहों को समर्थन देना सख़्त मना है। इसके बरअक्स, पाकिस्तान पर ये इल्ज़ाम लगते रहे हैं कि वह कुछ तंजीमों को “रणनीतिक एसेट” के तौर पर देखता रहा है, जिससे क्षेत्रीय अमन-ओ-अमान पर असर पड़ता है।
इन बयानों के असल असर भी कम नहीं हैं। पहली बात, इससे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख को नुक़सान पहुँचता है और FATF जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर उसकी पोज़िशन कमज़ोर होती है। दूसरी बात, ये रवैया इलाके में अस्थिरता को बढ़ावा देता है, जिससे आम अवाम—ख़ासकर नौजवान—कट्टरपंथ की तरफ़ धकेले जा सकते हैं।
आख़िर में, ये मामला सिर्फ़ एक बयान तक महदूद नहीं रहता, बल्कि एक बड़े नैरेटिव की तरफ़ इशारा करता है—जहाँ “रियासती दहशतगर्दी के लिंक” (state terror links) के इल्ज़ामात सामने आते हैं। जब तक इन सवालों का वाज़ेह और पारदर्शी जवाब नहीं दिया जाता, तब तक पाकिस्तान की काउंटर-टेरर पॉलिसी पर शक-ओ-शुबहात बने रहेंगे और आलमी बिरादरी की चिंताएं बढ़ती रहेंगी।
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