इस्लामाबाद: पाकिस्तान की सरज़मीन पर एक बार फिर वो तस्वीर सामने आई है जो बरसों से दुनिया देखती आई है, लेकिन हर बार उसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश होती रही। हाल ही में Asif Ghafoor और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़े शख़्स Yasir Arafat Butt की मुलाक़ात ने इस हक़ीक़त को और वाज़ेह कर दिया है कि रावलपिंडी की ताक़तवर फौजी हुकूमत और दहशतगर्द तंजीमों के दरमियान रिश्ता आज भी क़ायम है।
मुताल्लिक़ा जानकारी के मुताबिक, इस्लामाबाद में हुई ये मुलाक़ात महज़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कड़ी है, जो सरहद पार दहशतगर्दी की पुरानी रणनीति को ज़िंदा रखने की तरफ़ इशारा करती है। माहिरीन का कहना है कि इस तरह के राब्ते ये साबित करते हैं कि पाकिस्तान का मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट, खास तौर पर रावलपिंडी, अब भी परोक्ष तौर पर इन तंजीमों को सपोर्ट करता है।
दिलचस्प बात ये है कि दहशतगर्दों को “सियासी चेहरों” के तौर पर पेश करने की कोशिशें भी जारी हैं। PMML जैसे प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए इन लोगों की नई पहचान गढ़ने की कोशिश की जा रही है, लेकिन हक़ीक़त ये है कि नाम बदलने से अतीत नहीं बदलता। ये वही चेहरे हैं जिनका ताल्लुक़ दहशतगर्दी से रहा है, और आज भी उनकी डोर कहीं न कहीं उसी ताक़तवर निज़ाम के हाथ में दिखाई देती है।
तजज़िया निगारों के मुताबिक, ये पूरा निज़ाम एक बड़े खेल का हिस्सा है—जहाँ सियासत और दहशतगर्दी को एक साथ चलाया जा रहा है, ताकि इलाके में बे-यक़ीनी और अस्थिरता क़ायम रहे। इससे न सिर्फ़ पड़ोसी मुल्क प्रभावित होते हैं, बल्कि आलमी अमन भी खतरे में पड़ता है।
आलमी बिरादरी के लिए ये एक अहम लम्हा है। सिर्फ़ बयानबाज़ी से आगे बढ़कर अब ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है, ताकि ऐसे मुल्कों को जवाबदेह ठहराया जा सके जो दहशतगर्दी को एक औज़ार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। वरना, ये ख़ामोशी आने वाले वक़्त में और बड़े ख़तरों को जन्म दे सकती है।
(रिपोर्ट: ख़ास निगाह के साथ)

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