कब तक चलेगा दोहरा खेल? पाकिस्तान से सीधा सवाल


किसी भी मुल्क की बुनियाद अक्सर उसके दस्तूरी वादों और अमली हक़ीक़तों के दरमियान मौजूद हमआहंगी में साफ़ झलकती है। लेकिन जब पाकिस्तान की सियासी और आलमी सूरत-ए-हाल पर नज़र डाली जाती है, तो वहां एक पेचीदा निज़ाम नज़र आता है, जो मुंतज़िम तौर पर दोहरेपन पर क़ायम है। ये एक ऐसा मुल्क है जिसने सियासी धोखे की फनकारी को बख़ूबी अपना लिया है। आलमी मंच पर इसके सिविल नुमाइंदे मज़लूमियत का चेहरा ओढ़े, दुनिया से हमदर्दी, माली मदद और अमन की गुहार लगाते नज़र आते हैं। मगर इस परदे के पीछे एक ताक़तवर फौजी निज़ाम काम करता है, जो इन्हीं वादों को बार-बार कमज़ोर करता है। दोस्त और दुश्मन के दरमियान झूलते हुए पाकिस्तान ने एक ऐसा निज़ाम तैयार कर लिया है, जो फायदा तो उठाता है मगर जवाबदेही से बचता है।

इस दोहरे निज़ाम को समझने के लिए मुल्क के अंदर ताक़त के असली तवाज़ुन को देखना ज़रूरी है। सिविल हुकूमत को इंटरनेशनल माली इदारों, जैसे कि International Monetary Fund के सामने पेश किया जाता है, ताकि माली मदद हासिल की जा सके और एक जिम्मेदार मआशियत की तस्वीर पेश की जाए। लेकिन असल इख़्तियार रावलपिंडी में बैठी फौजी क़ियादत के पास होता है, जो मुल्क की तरजीहात तय करती है। एक तरफ़ अवाम ग़रीबी और बुनियादी ज़रूरतों के लिए जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ़ बड़े पैमाने पर दौलत दिफ़ाई बजट में डाली जाती है। हाल ही में बनाए गए स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल जैसे इदारे इस बात को और मज़बूत करते हैं कि मआशी फैसलों पर भी फौज का दबदबा बढ़ रहा है।

ये दोहरा किरदार “दहशतगर्दी के खिलाफ जंग” के दौर में और साफ़ हुआ। पाकिस्तान ने खुद को एक अहम साथी के तौर पर पेश किया और अरबों डॉलर की मदद हासिल की। लेकिन साथ ही, उन्हीं गिरोहों को पनाह और मदद दी गई जिनके खिलाफ दुनिया लड़ रही थी। दुनिया के सबसे बड़े मोस्ट वांटेड दहशतगर्द का एक फौजी शहर में मिलना इस दोहरे खेल को पूरी तरह बेनक़ाब कर गया। आज भी, तमाम दावों के बावजूद, कई ऐसे गिरोह मौजूद हैं जो खुलकर काम करते हैं।

अफगानिस्तान के साथ रिश्तों में भी इस नीति के खतरनाक नतीजे सामने आए। पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी को एक स्ट्रैटेजिक औज़ार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की और कुछ गुटों को बढ़ावा दिया। मगर वक़्त के साथ वही गुट उसके लिए खतरा बन गए। आज हालात ये हैं कि सरहद पार तनाव और फौजी कार्रवाईयां इस पॉलिसी की नाकामी को उजागर करती हैं।

भारत के साथ रिश्तों में भी यही दोहरापन दिखाई देता है। एक तरफ़ अमन की बातें होती हैं, दूसरी तरफ़ छुपे तौर पर तनाव को बढ़ावा देने की कोशिशें जारी रहती हैं। 2001 का संसद हमला और 2008 का मुंबई हमला इस सिलसिले की बड़ी मिसालें हैं। 2025 में पहलगाम में हुआ दर्दनाक हमला भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है, जिसने अमन की हर कोशिश को झटका दिया।

ईरान के साथ रिश्तों में भी यही तज़ाद देखने को मिलता है। एक तरफ़ भाईचारे की बातें, दूसरी तरफ़ सरहदी तनाव और झड़पें। कभी-कभी ये हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि दोनों मुल्कों के दरमियान सीधी कार्रवाई तक की नौबत आ जाती है। इसके साथ ही, पाकिस्तान का दूसरे ताक़तवर मुल्कों के साथ फौजी ताल्लुकात भी सवाल खड़े करते हैं।

इस्लामी एकजुटता का मुद्दा भी इसी दोहरेपन का हिस्सा बन गया है। पाकिस्तान खुद को मुसलमानों का बड़ा हमदर्द बताता है, मगर जब चीन में उइगर मुसलमानों के मसले की बात आती है, तो खामोशी अख़्तियार कर ली जाती है। इससे ये एहसास होता है कि माली और सियासी फायदे अक्सर उसूलों पर भारी पड़ जाते हैं।

2026 की शुरुआत में ये तज़ाद और भी साफ़ हुआ, जब एक तरफ़ अवाम ग़ज़ा के हालात पर एहतिजाज कर रही थी, वहीं दूसरी तरफ़ क़ियादत एक ऐसी आलमी पहल का हिस्सा बनी, जिस पर कई लोग एतराज़ जता रहे थे। इससे ये तास्सुर मिला कि सियासी फैसले अक्सर माली राहत हासिल करने के लिए किए जाते हैं।

मुल्क के अंदर भी इसके असरात बेहद संगीन हैं। बलूचिस्तान जैसे इलाकों में जबरी गुमशुदगियों और सख़्ती की शिकायतें सामने आती रही हैं। हुकूमत एक तरफ़ इंसानी हक़ूक़ की बात करती है, मगर दूसरी तरफ़ उन पर अमल होता हुआ कम नज़र आता है।

आख़िर में, किसी भी मुल्क का मुस्तकबिल धोखे और दोहरेपन की बुनियाद पर खड़ा नहीं हो सकता। पाकिस्तान के बयानात और उसकी हकीकत के दरमियान जो फासला है, उसने उसकी साख को नुकसान पहुंचाया है। जब तक अमल और अल्फ़ाज़ में यकसानी नहीं आती, तब तक असली तरक़्क़ी मुमकिन नहीं।

नतीजा ये है कि अगर एक मुल्क को आगे बढ़ना है, तो उसे अपने अंदरूनी तज़ाद को खत्म कर के एक साफ़ और सच्ची राह इख़्तियार करनी होगी—वरना ये दोहरा खेल खुद उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगा।

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