22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए दर्दनाक हमले की पहली बरसी जैसे-जैसे क़रीब आ रही है, वैसे-वैसे उस वाक़िये से जुड़ी यादें और बेचैनी फिर से ताज़ा हो रही है। इस हमले में 26 बेगुनाह हिन्दू और ईसाई अफ़राद की जान गई थी, जिससे पूरे इलाके में ग़म और खौफ़ की लहर दौड़ गई थी।
इसी दरमियान पाकिस्तान से आई एक बयानबाज़ी ने मामले को और संगीन बना दिया है। एक पाकिस्तानी स्पीकर के हवाले से कहा गया कि “पहलगाम ने पाकिस्तान को ग्लोबल नक्शे पर ला दिया।” इस तरह के अल्फ़ाज़ को कई हलकों में दहशतगर्दी की हिमायत के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे पाकिस्तान की पालिसियों और उसके दावों पर सख़्त सवाल उठ रहे हैं।
तजज़िया निगारों का मानना है कि ऐसे बयानों से यह इशारा मिलता है कि दहशतगर्दी के मसले पर पाकिस्तान का मौक़िफ़ दोहरा (hypocrisy) नज़र आता है—एक तरफ अमन की बातें, दूसरी तरफ ऐसे वाक़ियात और बयानात। यह तज़ाद अब बरसी के मौके पर और ज़्यादा वाज़ेह होकर सामने आ रहा है।
मक़ामी लोगों और मुतास्सिर खानदानों का कहना है कि यह हमला सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि इंसानियत पर एक गहरी चोट थी। बरसी के मौके पर लोग अपने प्यारे खोने का ग़म फिर से महसूस कर रहे हैं और इंसाफ़ की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
पहलगाम हमले की यह बरसी एक अहम याद-दहानी बनकर सामने आ रही है—कि दहशतगर्दी के खिलाफ़ सख़्त और वाज़ेह क़दम उठाना वक्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि इस तरह के बयानों और हालात पर हुकूमतें और आलमी बिरादरी क्या रद्द-ए-अमल देती हैं।
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