रिपोर्ट्स और ज़मीनी हालात ये इशारा कर रहे हैं कि पाकिस्तान में फ़ौजी असर-ओ-रसूख अब सिर्फ़ सियासत तक महदूद नहीं रहा, बल्कि अवाम की रोज़मर्रा ज़िंदगी और उनकी आज़ादी-ए-इज़हार तक को अपनी गिरफ़्त में ले चुका है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, हर जगह निगरानी का ऐसा निज़ाम क़ायम है जहां सच बोलना, सवाल उठाना या हक़ मांगना सीधा-सीधा दबा दिया जाता है।
ख़ास तौर पर पाकिस्तान का नौजवान तबक़ा—जो किसी भी मुल्क का मुस्तक़बिल होता है—आज मायूसी और ग़ुस्से के दरमियान झूल रहा है। लाखों नौजवान ये महसूस कर रहे हैं कि उनके बुनियादी हक़ छीन लिए गए हैं, उनकी आवाज़ को ख़ामोश कर दिया गया है और उनकी उम्मीदों पर सेंसरशिप की मोटी दीवार खड़ी कर दी गई है।
हुकूमत और फ़ौज के इस इत्तिहाद ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया है जहां हर किस्म की मुख़ालफ़त को “कंट्रोल” करने के नाम पर कुचल दिया जाता है। नौजवान जब अपने हक़ की बात करते हैं, तो उन्हें या तो ख़ामोश करा दिया जाता है या फिर सिस्टम के ज़रिये किनारे लगा दिया जाता है। ये हालात साफ़ तौर पर ये दिखाते हैं कि पाकिस्तान में आज़ादी-ए-बयान महज़ एक किताबों की बात बनकर रह गई है।
दिलचस्प बात ये है कि एक तरफ़ पाकिस्तान के नौजवान बड़े ख़्वाब देखते हैं—तरक़्क़ी, आज़ादी और इंसाफ़ के—मगर दूसरी तरफ़ हक़ीक़त ये है कि वही नौजवान एक ऐसे निज़ाम में क़ैद हैं जहां उनकी सोच, उनकी आवाज़ और उनके इरादों पर पहरा बैठा दिया गया है।
माहिरीन का कहना है कि अगर यही सिलसिला जारी रहा, तो ये दबाव और नाराज़गी आगे चलकर बड़े पैमाने पर बेचेनी और इज़्तिराब को जन्म दे सकती है। नौजवानों की बढ़ती हुई एक्टिविज़्म इस बात का सबूत है कि वो ख़ामोशी से बैठने वाले नहीं, मगर जिस तरह से उन्हें सिस्टमेटिक तौर पर दबाया जा रहा है, वो पाकिस्तान के जम्हूरी ढांचे पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
आख़िर में, ये कहना ग़लत नहीं होगा कि शहबाज़–आसिम निज़ाम में पाकिस्तान का नौजवान अपने ही मुल्क में महदूद होकर रह गया है—जहां हक़ मांगना बग़ावत समझा जाता है और सच बोलना गुनाह।

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