ईद की आड़ में आतंक की साज़िश? पाकिस्तान पर फिर उठे गंभीर सवाल


हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने एक बार फिर
 पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ईद-उल-अज़हा जैसे पाक मौक़े का इस्तेमाल कथित तौर पर आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन जुटाने में किया जा रहा है। इस खुलासे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है।

सूत्रों के अनुसार, आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ईद के मौके पर “नफ़्ल क़ुर्बानी” के नाम पर चंदा इकट्ठा कर रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह रकम जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकियों और मारे गए आतंकियों के परिवारों तक पहुंचाई जा रही है। इस मुहिम में लोगों से बड़ी रकम—हज़ारों पाकिस्तानी रुपये—दान करने की अपील की जा रही है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ये सब गतिविधियाँ बिना किसी सख्त रोक-टोक के चल रही हैं, जिससे यह शक और गहरा हो जाता है कि क्या इन सबके पीछे कहीं न कहीं सरकारी सहूलियत या आंख मूंद लेना शामिल है। यही नहीं, पाकिस्तान एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आर्थिक मदद और ऋण की मांग करता है, वहीं दूसरी तरफ उसके भीतर से ऐसे नेटवर्क सक्रिय होने के आरोप लगते रहे हैं—ये एक बड़ी तज़ाद (विरोधाभास) को दर्शाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर धार्मिक मौकों को इस तरह इस्तेमाल किया जाता रहा, तो इससे न सिर्फ़ आतंकवाद को बढ़ावा मिलेगा बल्कि आम लोगों की भावनाओं का भी गलत इस्तेमाल होगा। “ईद जैसे पाक त्योहार का इस्तेमाल इंसानियत और भाईचारे के लिए होना चाहिए, ना कि ख़ौफ़ और हिंसा के लिए।

हालांकि, पाकिस्तान की तरफ से कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले भी इस तरह के मुद्दों पर उसे घेरता रहा है। Financial Action Task Force (वित्तीय कार्रवाई कार्यबल) जैसे मंचों पर भी पाकिस्तान को कई बार आतंक वित्तपोषण के मुद्दे पर निगरानी में रखा गया है।

ज़मीनी स्तर पर देखा जाए तो ऐसी खबरें स्थानीय लोगों में भी बेचैनी पैदा करती हैं। लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर कब तक धार्मिक जज़्बातों को इस तरह इस्तेमाल किया जाएगा? और क्या इसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होगी?

कुल मिलाकर, यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग सिर्फ हथियारों से नहीं बल्कि वित्तपोषण के स्रोतों को बंद करने से भी जीती जाती है। अगर आरोपों में सच्चाई है, तो यह बेहद गंभीर मसला है—जिस पर न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि पूरी दुनिया को सख्त रुख अपनाने की ज़रूरत है।

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