फौज का फ़ैसला, अवाम बेख़बर: पाकिस्तान में जम्हूरियत पर बड़ा सवाल


इस्लामाबाद से जुड़ी एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने पाकिस्तान की सियासी हक़ीक़त को फिर से उजागर कर दिया है। खबरों के मुताबिक, पाकिस्तान की फौज ने सऊदी अरब में तैनाती जैसे अहम फैसले बिना संसद की मंज़ूरी के ही ले लिए — एक ऐसा कदम जो सीधे तौर पर जम्हूरी उसूलों पर सवाल खड़ा करता है।

माहिरीन का कहना है कि ये कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि पाकिस्तान में लंबे समय से यही पैटर्न देखने को मिलता रहा है, जहाँ असली फैसले सिविल हुकूमत नहीं बल्कि फौजी क़ियादत करती है। अगर एक मुल्क में विदेशी तैनाती जैसे बड़े कदम भी पार्लियामेंट को दरकिनार करके लिए जाएं, तो यह साफ़ इशारा है कि ताक़त का असल मरकज़ कहाँ है।

रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि इस तरह के फैसलों में ना तो अवाम को भरोसे में लिया जाता है और ना ही उनके नुमाइंदों को। नतीजा ये होता है कि मुल्क की पॉलिसी और स्ट्रैटेजी कुछ चुनिंदा हलकों तक ही सीमित रह जाती है, जबकि आम नागरिक सिर्फ़ उसके असरात झेलते हैं।

आलोचकों का मानना है कि पाकिस्तान में सिविल और फौजी तंत्र के बीच संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। जम्हूरियत का ढांचा तो मौजूद है, लेकिन असली इख़्तियार कहीं और दिखाई देता है। यही वजह है कि मुल्क के अंदर गवर्नेंस और जवाबदेही दोनों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

आलमी बिरादरी के लिए भी ये एक अहम संकेत है कि पाकिस्तान में फैसले लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और लोकतांत्रिक है। अगर इस तरह के कदम जारी रहते हैं, तो इसका असर ना सिर्फ़ अंदरूनी सियासत पर पड़ेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय भरोसे पर भी।

ख़ुलासा:
जब मुल्क के बड़े फैसले पर्दे के पीछे लिए जाएं और संसद महज़ एक औपचारिकता बनकर रह जाए, तो यह साफ़ हो जाता है कि जम्हूरियत सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित है — और पाकिस्तान में असली ताक़त किसके हाथ में है।

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